श्री श्री के उत्सव के बाद नरेंद्र मोदी अब ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ की भी शान बनेंगे: ABP News

मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार | Last Updated: Sunday, 13 March 2016

श्री श्री रविशंकर के ‘विश्व सांस्कृतिक उत्सव’ के बाद दिल्ली में उदारवादी मुसलमानों का भी एक बड़ा जलसा ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ होने वाला है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 17 मार्च को दिल्ली के विज्ञान भवन में इसका शुभारम्भ करेंगे. ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ में इस्लामिक आतंकवाद के बढ़ते ख़तरों से निपटने की दीर्घकालीन और बहुआयामी रणनीति पर चर्चा की जाएगी. दिल्ली में पहली बार हो रहे चार दिन के इस आयोजन में भी क़रीब 200 विदेशी प्रतिनिधियों के शामिल होने का अनुमान है. 20 देशों से आने वाले ये मेहमान सूफ़ीवादी इस्लाम के जाने-माने विद्वान हैं. ‘ऑल इंडिया उलेमा एंड मशाइख़ बोर्ड’ (AIUMB) के बैनर तले होने वाले इस आयोजन का समापन 20 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली करके होगा. रैली में एक लाख लोगों के शामिल होने का दावा है.

वहाबी, जहां इस्लाम का सबसे कट्टरवादी स्वरूप है. वहीं, सूफ़ीवाद, इस्लाम का सबसे उदारवादी चेहरा है. भारत में सदियों से सूफ़ीवाद की जड़ें बहुत गहरी रही हैं. अज़मेर के ग़रीब नवाज़ ख़्वाज़ा मोईनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, आगरा में फ़तेहपुर सीकरी के सलीम चिश्ती, मुम्बई के सैय्यद हाज़ी अली शाह बुख़ारी जैसी हस्तियां उन सैकड़ों इस्लामी सन्तों में शामिल रही हैं जिन्होंने सूफ़ीवाद को इस्लाम का असली रूप माना. इसमें आपसी भाईचारे और प्यार-मोहब्बत के पैग़ाम को ही असली इस्लामिक व्यवहार बताया गया है. लेकिन हाल के दशकों में जिस तरह में सऊदी अरब, सीरिया और इराक़ जैसे देशों में पनाह पाने वाले वहाबी कट्टरवाद का प्रभाव बढ़ा है उसने उदारवादियों को बहुत बेचैन कर रखा है.

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दुनिया भर से ये आवाज़ें उठती रही हैं कि उदारवादी मुसलमानों को आगे आकर ग़ुमराह लोगों को सही राह दिखानी चाहिए. इसीलिए अब सुन्नी सूफ़ीवाद में यक़ीन रखने वाले इस्लामी विद्वान ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ के तहत एकजुटता दिखाएंगे. तय हुआ कि सूफ़ीवाद के सन्देश को नयी ऊर्जा देने के लिए भारत को चुना जाए. इंडोनेशिया के बाद भारत में ही दुनिया के सबसे ज़्यादा मुसलमान रहते हैं. सदियों से भारतीय मुसलमान यहां की विविधतापूर्ण विरासत का हिस्सा रहे हैं. कट्टरवाद के सिर उठाने का सबसे ख़राब असर इन्हीं उदारवादियों पर पड़ा. लिहाज़ा, सूफ़ी तीर्थस्थलों और मुसलिम धर्मगुरुओं, उलेमाओं, इमामों और मुफ़्तियों का शीर्ष संगठन AIUMB ने तय किया कि वो दुनिया भर में असली इस्लामिक सन्देश से भटके हुए लोगों को रास्ते पर लाने के लिए अपनी मुहिम तेज़ करेगी.

इन्हीं इरादों के साथ अगस्त में प्रधानमंत्री निवास पर नरेन्द्र मोदी से AIUMB के प्रतिनिधिमंडल ने मुलाक़ात की. इनकी अगुवाई AIUMB के अध्यक्ष हज़रत सैय्यद मोहम्मद अशरफ़ ने की. तब प्रधानमंत्री मोदी ने इन लोगों से सवाल किया था कि क्या वजह है कि मुट्ठी भर कट्टरवादियों के आगे उन करोड़ों उदारवादी सूफ़ी मुसलमानों की आवाज़ दब रही है जो सदियों से अमन और भाईचारे का पैग़ाम देते आये हैं. तभी मोदी ने AIUMB को इस्लामिक आतंकवाद के ख़िलाफ़ उदार मुसलमानों को आगे लाकर दिल्ली में विशाल जलसा करने और दीर्घकालिक रणनीति बनाने का मशविरा दिया था. मोदी ने तभी ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ में ख़ुद हाज़िर होने और विदेशी प्रतिनिधियों को वीज़ा वग़ैरह में सरकार का पूरे सहयोग देने का भरोसा दिया था.

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चार दिवसीय ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ के शुभारम्भ के लिए विज्ञान भवन को इसलिए चुना गया क्योंकि वो वैश्विक आयोजनों के लिए देश का शीर्षस्थ स्थान है. वही दिल्ली का सबसे बड़ा सम्मेलन स्थल है और वहां के सुरक्षा इंतज़ाम सबसे उम्दा हैं. लेकिन 18 और 19 मार्च को तमाम सूफ़ी विद्वानों की परिचर्चा दिल्ली में लोदी रोड स्थित इंडिया इस्लामिक सेंटर में होगी. वहां देश भर से आये मदरसों के विद्वान, दरग़ाहों के ख़ानक़ाह वग़ैरह अपने रिसर्च पेपर्स पेश करेंगे. इनके संकलन से हज़ार पन्नों की एक क़िताब तैयार की जाएगी. इसमें इन बातों को विस्तार से बताया जाएगा कि कैसे कट्टरवादी लोग अपने निहित स्वार्थ के लिए क़ुरआन की भ्रष्ट व्याख्या करके मुसलमानों को बहका रहे हैं.

इस्लामिक झंडे तले जिस ढंग से दाइश और आईएसआईएस का प्रचार किया जा रहा है, वो पूरी तरह से इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ है. ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ का मक़सद उन लोगों और संगठनों के दुष्प्रचार को बेनक़ाब करना भी है जो विदेशी पैसों की बदौलत भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में नफ़रत और असहिष्णुता फैला रहे हैं. ऐसी हरक़तें पूरी तरह से मानवाधिकारों के भी ख़िलाफ़ हैं. इससे सारी दुनिया में इस्लाम की छवि को गहरा धक्का लग रहा है. इसीलिए ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ के आयोजक चाहते थे कि उनके वैश्विक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शामिल होने से सारी दुनिया में क़ायम भारत की उदार छवि और मज़बूत होगी.

20 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली रैली को मुख्य रूप से पाकिस्तान से निष्कासित सूफ़ी विद्वान डॉ ताहिरुल क़ादरी, शेख़ हाशिमुद्दीन अल-गिलानी (बग़दाद), शेख़ अफ़ीफ़ुद्दीन अल-जिलानी (इराक), स्टेफ़न सुलेमान स्वार्ज़ (अमेरिका), शेख़ मोहम्मद बिन याहया अल-निनोवी (अमेरिका) जैसे लोग सम्बोधित करेंगे. उम्मीद है कि ‘विश्व सूफ़ी फ़ोरम’ इस्लामिक दुनिया पर गहराये कट्टरवाद के काले बादलों को हटाने की दिशा में एक यादगार शुरुआत बन पाएगा.