नफरत फैलाने वालों से सख्ती से निपटे सरकार: सय्यद मोहम्मद अशरफ

18 अक्टूबर 2020, नई दिल्ली,प्रेस रिलीज
आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वर्ल्ड सूफ़ी फोरम के चेयरमैन हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने देश में बढ़ती नफरत और इस काम में लगी ऐसी संस्थाओं की कड़ी निन्दा करते हुए कहा कि देश में अमन कायम रहे इसके लिए सरकार को नफरत के कारोबारियों से सख्ती से निपटना होगा।
उन्होंने आल इंडिया सूफ़ी सज्जादा नशीन काउंसिल के राष्ट्रीय संयोजक हज़रत अब्दुल खादेर कादरी वहीद पाशा को फोन के माध्यम से अंजाम भुगतने व जान से मारने की धमकी पीएफआई/ एसडीपीआई का सदस्य बताने वाले व्यक्ति फाजिल के द्वारा दिए जाने पर रोष व्यक्त किया है,उर्दू अख़बार एत्माद में प्रकाशित लेख ,’जिसमें एसडीपीआई /पीएफआई के माध्यम से जनता को सचेत किया गया था एवम उनकी सत्यता बयान करते हुए जनता से ऐसे संगठन से दूरी बनाने की बात कही गई थी, जिससे भारत की शांति व्यवस्था बनाए रखने में व्यवधान पैदा होता है।लेख में कहा गया है कि पीएफआई/एसडीपीआई एक कट्टरपंथी सल्फी विचारधारा से प्रेरित संगठन है, जिसकी विचारधारा आतंकवाद को बढ़ावा देती है ,और आईं एस एआई एस जैसे संगठन से मेल खाती है ,इसके द्वारा भारत की सैकड़ों वर्ष पुरानी सूफ़ी परंपरा पर हमला किया जा रहा है जिसमें प्रेम ही प्रेम है ।
इस लेख पर पीएफआई / एसडीपीआई का खुद को सदस्य बताने वाले व्यक्ति द्वारा जिस तरह की प्रतिक्रिया दी गई है वह इस संगठन की भयावयता को बताने के लिए काफी है,आखिर किस तरह की सीख दी जा रही है जिससे इंसान हैवान बना जा रहा है, विरोध का हिंसक तरीका विचार की गन्दगी को सामने रखता है,।
हज़रत ने कहा कि नफरत फैलाने वाला कोई भी हो और खुद को किसी भी धर्म से जोड़ता हो उसे सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए,क्योंकि मोब्लिंचिंग जैसे घिनौने अपराध हो या फिर आतंकवाद की कायराना घटना यह सब देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं ।
उन्होंने साफ तौर से हर प्रकार की नफरत फैलाने वाली घिनौनी सोच रखने वाले संगठनों पर सख्ती के साथ कार्यवाही करने की मांग की हज़रत ने कहा कि देश की तरक्की शांति के बिना संभव नहीं है और ऐसे कायर लोग देश के दुश्मन हैं जो नफरत का कारोबार फैलाए हुए है।

अदालतों का काम इंसाफ देना नाइंसाफी ज़ुल्म है: सय्यद मोहम्मद अशरफ

2 अक्टूबर ,नई दिल्ली आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड के अध्यक्ष एवं वर्ल्ड सूफ़ी फोरम के चेयरमैन हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लखनऊ के सी बी आई कोर्ट के आये फैसले पर दो टूक कहा कि इंसाफ और फैसले में फर्क है इसे समझा जाना चाहिये अगर इंसाफ नहीं होता तो यह ज़ुल्म है जिससे बेयकीनी जन्म लेती है । हज़रत ने मुसलमानों से अपनी बात दोहराई और अपील करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर इस फैसले पर बहस न करें इससे बचें।
उन्होंने कहा कि मुसलमानों को सुलह हुदैबिया को समझना होगा कि पैग़म्बरे अमन ने किस खूबसूरती से इसे अंजाम दिया और जिसका नतीजा फतह हुई जो लोग इसके बारे में नहीं जानते उन्हें चाहिए कि उलमा से इसे सुने समझें और जाने हमारे लिए हर मुसीबत का हल पैगम्बरे अमन की प्यारी सीरत में मौजूद है हमें उसे पढ़ना होगा और उसपर अमल करना होगा यही हमारे लिए निजात का जरिया है हमें यकीन रखना चाहिये कि ज़ुल्म बहुत देर तक कायम नहीं रहता ।
अदालत जो मजलूम को इंसाफ देने के लिए बनी है अगर ऐसे फैसले करेगी तो ज़ालिम की हिमायत होगी जिससे समाज में असंतुलन पैदा होगा और अपराधी बेखौफ हो जायेंगे जिससे शरीफ शहरियों की ज़िन्दगी दुश्वार होगी और मुल्क में अफरा तफरी का माहौल बनेगा यह सोचने का वक्त है कि हम कैसा देश बना रहे हैं जहां अदालत सबूतों के मौजूद होने के बाद भी इस तरह के फैसले दे रही है और पूरे अदालती निज़ाम को कटघरे में खड़ा कर रही है।
हज़रत ने ख़ास तौर से मुस्लिम युवाओं से कहा कि यह सब्र और होशियारी का वक़्त है हमें किसी भी कीमत पर नफरत के कारोबारियों की चाल को कामयाब करने में मदद नहीं करनी है और अगर आप सोशल मीडिया के जरिए इस फैसले पर बात करते हैं तो हम उनके मददगार अनजाने में बन जाते हैं हमें खबर भी नहीं होती कि हम क्या कर रहे हैं और अपनी नासमझी के चलते हम जाल में फांस जाते हैं।
अभी मुल्क में जिस तरह कोरोना का कहर टूटा हुआ है,किसान सड़कों पर हैं नवजवान बेरोजगार हैं ऐसे में हमें इस फिजूल बहस से बचने की जरूरत है और अपने मुल्क की फिज़ा को बेहतर बनाने की कोशिश में जुटे रहना है।अदालतों को अपना काम करना है और हैं सबको अपना ,हमारा काम है मोहब्बत सबके लिए नफरत किसी से नहीं अगर हम अपना काम ईमानदारी से करेंगे तो बदलाव यकीनी है और इसी बदलाव में तरक्की की राह है ,।

यज़ीद के नाम का नारा लगाने वाले इंसानियत के दुश्मन : सय्यद मोहम्मदअशरफ

18 सितंबर, शुक्रवार किछौछा अम्बेकरनगर
आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड के अध्यक्ष एवं वर्ल्ड सूफ़ी फोरम के चेयरमैन हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने खानकाहे अशरफियां शेखे आज़म सरकारें कलां में उर्स मख़दूम अशरफ जहांगीर सिमनानी रहमतुल्लाह अलैहि के एक कार्यक्रम में बोलते हुए पाकिस्तान में यजीद ज़िंदाबाद जैसे नारो के साथ निकाली गई रैली की पुरजोर निंदा की ,उन्होंने कहा यह लोग जो यजीद ज़िंदाबाद का नारा लगा रहे हैं यह अहलेबैत के दुश्मन हैं यानी अमन के दुश्मन है और पूरी इंसानियत के दुश्मन हैं।
उन्होंने कहा कि हम न तो सहाबा की शान में गुस्ताखी बर्दाश्त कर सकते हैं और न ही अहलेंबैत की गुस्ताखी, उनकी शान पर हमारी जान कुर्बान है,दुनिया में जिस तरह के हालात बन रहे हैं ऐसे में दुश्मनों के पैसों पर पलने वाले इस तरह की बातों को उठा रहे हैं ,जिससे हमारे दिल को तकलीफ हो और लोग सड़कों पर आमने सामने आ जायें और अपने असल मकसद इत्तेहाद और अमन से भटक जायें।
उन्होंने हाल में हुए इजरायल और यूएई समझौते को इस पूरी घटना की वजह करार दिया ,उन्होंने कहा क्योंकि इत्तेहाद बैनुल मुस्लेमीन से इस्लाम के दुश्मनों को खतरा है उन्हें लगता है अगर यह एक जगह हुए तो इन्हें तरक्की से नहीं रोका जा सकता है लिहाज़ा कभी आसिफ अशरफ जलाली जैसे फितनेबाज़ जनाबे फातिमा सलामुल्लाहअलहिया की शान में गुस्ताखी करता है और उसके बाद आसिफ रज़ा अल्वी का जनाबे सिद्दीके अकबर रज़ीअल्लाहुतालाअन्हु की शान में गुस्ताखी करना इसी कड़ी का हिस्सा है इस तरह के लोगों को हमें अपनी सफों से बाहर निकालना होगा यह अमन के दुश्मन हैं और गैरों के हाथ में खेलने वाले बेज़मीर लोग,उन्होंने कहा कि यह भी अजीब इत्तेफाक़ है कि यह दोनो जिनकी वजह से अब तक छिपे हुए यजीदी पैरोकार खामोश थे बाहर निकल पड़े और इन दोनों का नाम भी एक ही है,।
पाकिस्तान में जिस तरह का मसलकी हंगामा खड़ा हुआ है उससे हम भारतीय मुसलमानों को होशियार रहना चाहिए और अपने मुल्क में बदमनी के हर मुमकिन खतरे को पहले से भांप कर उसको उठने नहीं देना चाहिए,जो कुछ भी इस वक़्त हो रहा है यह विदेशी साजिश का हिस्सा है जिसके जरिए हमें अपने असल मकसद से भटका कर तरक्की से रोका जा रहा है हम ऐसी हर साजिश की पुरजोर मुखालफत करते हैं और ऐसे लोगों से होशियार रहने की अपील करते हैं हमें अपने मुल्क में ऐसे लोगों की सोच को पनपने नहीं देना है ताकि हमारे मुल्क की फिज़ा खराब न हो।

کرونا کے خاتمے کی دعاؤں کے ساتھ شروع ہوا عرس مخدومی

ستمبر16 کچھوچھہ، امبیڈکر نگر
عرس حضرت مخدوم اشرف جہانگیر سمنانی رحمۃاللہ علیہ کرونا کے چلتے انتظامی اصولوں کی پابندیوں کے ساتھ شروع ہو گیا ہے جس میں عام زائرین کو آنے سے منع کیا گیا ہے اور اعلان کیا گیا ہے کہ عقیدت مند اپنے گھروں میں ہی فاتحہ خوانی کریں اور آس پاس کے غریبوں کی مدد کریں، تمام ضروری احتیاطی تدابیر اختیار کرتے ہوئے صرف مقامی لوگ درگاہ شریف آسکتے ہیں۔
اس موقع پر آل انڈیا علماء و مشائخ بورڈ کے صدر اورورلڈصوفی فورم کے چیئرمین حضرت سید محمد اشرف کچھوچھوی نے خانقاہ اشرفیہ شیخ اعظم سرکار کلاں میں پرچم کشائی کی رسم ادا کی اور پوری دنیا سے اس خطرناک وائرس کے خاتمے کے لئے دعا کی۔انہوں نے اس موقع پر کہا کہ یہ بڑا دکھ کا موضوع ہے کہ ہم لوگوں کو مخدوم پاک کے آستانے پر آنے سے کچھ وقت کے لئے روک رہے ہیں لیکن لوگوں کو بیماری سے بچانا بھی حضرت مخدوم پاک کا ہی پیغام ہے۔ ہر ولی کو کسی نہ کسی نبی کامعجزہ کرامت کے طور پر ملا ہے۔حضرت مخدوم اشرف جہانگیر سمنانی رحمۃ اللہعلیہ پرتوے عیسیٰ ہیں،یعنی آپ مریضوں کو رب کی عطا کی ہوئی کرامت سے فائدہ پہنچاتے ہیں۔ یہی وجہ ہے کہ پورے سال مخدوم پاک کے آستانے پر مریضوں کا ہجوم لگا رہتا ہے اور ہزاروں کی تعداد میں پریشان حال مخلوق آپ کی بارگاہ سے صحتیابی کی بیش قیمتی دولت سے مالامال ہوتی ہے۔چنانچہ جب پوری دنیا اس بیماری کے چکر میں پھنس گئی ہے کہ لوگ مل بھی نہیں سکتے ہیں تو ہم آپ کی بارگاہ سے اپنے رب کو پکارتے ہیں کہ دنیا کو اس بیماری سے نجات ملے۔
حضرت نے دنیا بھر میں آباد عاشقان مخدوم پاک کو عرس کی مبارکباد پیش کرتے ہوئے کہا کہ سبھی لوگ ضروری احتیاط برتیں اور گھروں میں ذکر کا ورد کرکے اپنے رب کو راضی کریں، یہ وقت سخت ہے لوگوں کی مدد کریں بنا ان کی ذات،مسلک اور مذہب پوچھے۔

कोरोना वायरस से ज़्यादा खतरनाक है नफरत का वायरस : सय्यद मोहम्मद अशरफ

17 मार्च, 2020 महराजगंज
आल इंडिया व मशाइख़ बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वर्ल्ड सूफी फ़ोरम के चेयरमैन हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि कोरोना वायरस से अधिक खतरनाक नफरत का वायरस है।
उन्होंने कहा कि हम कोरोना से बचने के लिए मास्क तो पहन रहे हैं लेकिन नफरत से बचने के लिए ज़हरीली जुबानों को नहीं रोक रहे हैं,हम वायरस से बचने के लिए बार बार हैंडवाश या साबुन से हाथ धो रहे हैं लेकिन उन हाथों को लोगों की मदद के लिए नहीं बढ़ा रहे, खांसते या छींकते वक़्त बीमारी के डर से मुंह को ढाप रहे हैं लेकिन किसी जरूरतमंद के कपड़ों का इंतजाम नहीं कर रहे।
हज़रत ने कहा कि दुनिया कोरोंना से एकजुट होकर लड़ लेगी इसकी दवा बनाकर इसे हरा भी देगी लेकिन इससे ज़्यादा खतरनाक बीमारी का इलाज होते हुए भी इसे खतम करने को तैयार नहीं है।
जबकि सिर्फ एक मुस्कुराहट इस वायरस से बचा सकता है,एक ख़ामोशी,इंसाफ और लोगों की मदद करने का जज्बा इसका इलाज है अगर सब इस काम में लग जाएं तो इस वायरस को खतम कर इसपे जीत हासिल की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि हम कोरोना को सुन्नते रसूल पे अमल कर हरा देंगे क्योंकि डॉक्टर जो बचाव के तरीके बता रहे हैं वह नबी की सुन्नत है इसी तरह हम नफरत के वायरस को भी नबी की सुन्नत पर अमल कर हरा सकते हैं जो सूफिया ने करके दिखाया और संदेश सुनाया कि नफरत किसी से नहीं मोहब्बत सबके लिए।

डर के माहौल में शिक्षा संभव नहीं और बिना शिक्षा विकास : सय्यद मोहम्मद अशरफ

जेएनयू केम्पस में नाक़ाबपोश गुंडों का हमला देश के भविष्य पर हमला
6 जनवरी मुम्बई,
आल इंडिया उलमा व मशाइख़ बोर्ड के अध्यक्ष एवं वर्ल्ड सूफी फ़ोरम के चेयरमैन हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने कल जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के कैम्पस में हुई हिंसा की कड़ी निन्दा करते हुए कहा कि जो भी यूनिवर्सिटी कैम्पस में घुस कर इस तरह की हिंसा कर रहे थे फौरन उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए क्योंकि डर के माहौल में शिक्षा संभव नहीं है और शिक्षा के बिना विकास संभव नहीं।
हज़रत ने कहा कि यह वाकई हैरत में डालने वाली बात है कि इतने हथियारबंद लोग विश्विद्यालय में कैसे प्रवेश कर गये और लोकल सुरक्षा कर्मी उन्हें रोकते नहीं हैं, आखिर यह किस तरह का माहौल बन रहा है, अगर ऐसा ही चलता रहा तो लोग अपने बच्चों को कैसे पढ़ने के लिए भेजेंगे, इस तरह कैसे भारत पढ़ेगा और आगे बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि इस मामले में राजनीत नहीं होनी चाहिए यह भारत के भविष्य का सवाल है, सभी लोगों को एकजुट होकर इस तरह की घटनाओं को रोकने का प्रयास करना होगा यदि ऐसा नहीं हुआ तो देश का विकास बाधित होगा। जिन बच्चों को चोट आई है हम उनके जल्द स्वस्थ्य होने की दुआ करते हैं और छात्र छात्राओं को विश्वास दिलाना चाहते हैं कि देश के सभी अमन पसंद लोग आपके साथ खड़े हैं, आपको भयभीत होने की जरूरत नहीं है।
सभी विश्विद्यालयों के छात्र छात्राओं से हम यह अपील भी करते हैं कि किसी भी तरह की हिंसा का विरोध कीजिए और अगर आपके बीच कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे रोक दीजिए, आप देश का भविष्य हैं और हम सब आपके साथ हैं। देश की कानून व्यवस्था पर भरोसा रखिए, मतभेद होना चाहिए मनभेद नहीं यही तरक्की की राह है, किसी के बहकावे में न आएँ न ही अफवाहों पर ध्यान दें।

यूनुस मोहानी

AIUMB के शादाब हुसैन रिज़वी अशरफी बने दिल्ली हज कमेटी के सदस्य।

3 जुलाई,नई दिल्ली
दिल्ली हज कमेटी में सामाजिक संगठन से लिए जाने वाले सदस्य के रूप में आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड दिल्ली शाखा के अध्यक्ष सय्यद शादाब हुसैन रिज़वी अशरफी को नामित किया गया है।
सय्यद शादाब लंबे समय से हज यात्रियों की सेवा निस्वार्थ भाव से करते रहे हैं और लगातार हाजियों की हर संभव मदद करते रहे हैं ,उनके इस समर्पण भाव को देखकर उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त समझा गया । सय्यद शादाब लगातार AiUMB के जरिए सामाजिक कार्य करते रहे हैं और दिल्ली में 2016 मार्च में संपन्न हुए विश्व शांति के उद्देश्य से आयोजित वर्ल्ड सूफी फोरम में अग्रणी भूमिका में रहे और लगातार समाज में व्याप्त बुराइयों के विरूद्ध अभियान चलाते रहे हैं।
शांति बहाली और मोहब्बत का संदेश जन जन तक पहुंचाने की उनकी शैली लोकप्रिय है ।
सय्यद शादाब को दिल्ली हज कमेटी का सदस्य बनाए जाने पर आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड के संस्थापक अध्यक्ष एवम् वर्ल्ड सूफी फोरम के चेयरमैन हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने मुबारकबाद देते हुए कहा कि हमारी दुआ है कि आजमीने हज की और खिदमत करे और अपनी मेहनत और कोशिश से वहां हाजियों को होने वाली तकलीफों को दूर करने में कामयाब हो ,अपने ओहदे को एजाज़ नहीं ज़िम्मेदारी मानते हुए काम करें।हज़रत ने दिल्ली सरकार को भी शुक्रिया कहा।

By: यूनुस मोहानी

India and Iran: How these two ancient civilisations can curb radicalism:First Post

Ghulam Rasool Dehlvi  May 31, 2016 16:45 IST

firstpost

Recently, I was in the capital of Iran, Tehran when the epoch-making trilateral relations were built between India, Iran and Afghanistan. After 15 years, the Prime Minister of India, Narendra Modi visited Iran to rejuvenate the bilateral ties. He signed a $500m deal to develop Iran’s Chabahar port in a strategic effort to open up India’s trade routes to Afghanistan and Europe. According to the Chabahar project which was agreed between PM Narendra Modi and the Iranian President Hassan Rouhani, India will invest billions of dollars in Iran following the removal of sanctions. Indeed, this deal will greatly help to deepen ties between India and Iran in business, commerce, agriculture, culture and education. But one wonders how India and Iran can exert joint efforts in countering extremism and growing radicalism? This is a relevant question because the two countries have also agreed to consult ‘closely and regularly’ on combating the threats of radicalism and terrorism.

Since India and Iran share grave concerns at the spread of radicalised forces, their agreement over close and regular consultation on combating threats of radicalism is well received in the region. To curb extremist thoughts and hardcore philosophies, both countries have great potentials and civilisational forces stemming from their ancient inclusive and pluralistic cultures.

As Narendra Modi pointed out, India and Iran are not new friends. Their friendship [or ‘dosti’ in the Persian language] is as old as history. Through centuries, their societies have stayed connected through culture, art and architecture, poetry, spiritual traditions and commerce. Today, when terrorism and radicalism are among the most baffling problems in the region, it was urgent and timely for the two governments to sit together and brainstorm effective ways to tackle the radical onslaught. Modi has rightly pointed out that India and Iran “share a crucial stake in peace and stability” and that “both share common concerns relating to radicalism and terrorism.” Therefore, the two countries have agreed to enhance cooperation between their defence and security institutions. Already, both establishments have spent a large amount of money on internal security, domestic peace and counter-terrorism. But what seems more effective to help the two countries in their bid to curb extremism is their renewed pledge to preserve the rich ancient culture of religious pluralism, peaceful co-existence and celebration of multiculturalism.

Narendra Modi in Iran. File photo. Twitter/@MEAIndia

Narendra Modi in Iran. File photo. Twitter/@MEAIndia

The ancient civilizations of the both the Vedic and Islamic countries have been inclusive and welcoming to foreign cultures. In his address to the conference on traditional linkages between India and Iran before winding up his two-day visit to Iran, Mr Modi highlighted Sufism and other cultural linkages as ‘a perfect response to those who preach radical thoughts in our societies’.

It is interesting to note that the current Indian PM has been consistently celebrating the universal appeal of Sufism as ‘a rich product of India’.

It is common knowledge now that after his participation in the World Sufi Forum recently held in Delhi, PM Modi is seen constantly preaching religious pluralism, the composite nature of Indian culture and its diversity. For instance, in his recent visit to Brussels in the wake of terrorist attacks on Belgium, he ardently praised Islam and its offshoot Sufism referring to the World Sufi Forum. He affirmed: “In recent days in India, liberal Islamic scholars, linked to Sufism, said those who speak of terror are un-Islamic. The more such voices rise, the faster the radicalization of youth can be prevented”.

Similarly, in his visit to Iran, the Indian PM delivered a remarkable speech on Sufism and its humanitarian approach to strengthen Indio-Iran relations. Recalling the historical religious and traditional bearings of the two countries, Modi invoked Sufism as the binding force that unites the world as one family. “Sufism, rich product of our ancient links, carried its message of true love, tolerance, acceptance to entire mankind,” he remarked in his speech in Tehran.

In my own recent experience in several historic cities of Iran, particularly Qom, Shiraz, Mashhad, Isfahan and the capital Tehran, I could see the same culture of peace emanating from deep-rooted Islamic mysticism. The pluralistic essence of Sufism which both India and Iran share in common has contributed to the growth of moderate and tolerant societies in both the countries. Iranians reflect the very spirit of Sufism, which Mr. Modi recalled as “voice of peace, co-existence, compassion and equality.” It is equally embedded in the Indian Vedic concept of ‘Vasudhaiva Kutumbakam’, which means that the ‘World is one family’.

Similarly, there are striking parallels between the ancient heroes and epics of the two countries. The holy shrines [dargahs] of Khawaja Gharib Nawaz in Ajmer Sharif and Hazrat Nizamuddin Aulia in Delhi are equally adored in Iran. Much in the same way, Mahabharata of India and Shahnama of Iran, Bhima of Bharat and Rustam of Persia and Arjuna and Arsh of the two countries bear great symbiosis in universal values and egalitarian messages for brotherhood of mankind.

This is an established historical fact that Islam in India and Iran owes much of its existence to Sufi saints and dervishes like Shaikh Sa’adi and Hifiz Sherazi in Iran and the 13th century Sufi saint Khwaja Ghareeb Nawaz of Ajmer Sharif in India. Gharib Nawaz came from Iran to India and rendered great humanitarian services. His peace activism is regarded a milestone in the path of love, human equality, spirituality and religious pluralism. Thus, this peaceful and pluralistic Indian tradition ushered in a new era of composite culture in the country which still remains well-spirited and widely accepted among the Indian common masses regardless of faith and creed. After Khwaja Ghareeb Nawaz, one of the most celebrated Indian Sufi masters, Makhdum Sayed Ashraf Jahangir Simnani (1287 – 1386 CE) left his birthplace Simnan in Iran and settled in India. Revered by both Indian and Iranian Muslims, Makhdum Simnani was a prominent Sufi Shaikh belonging to the Chishti and Qadiri Sufi orders. He became the disciple of the well-known Sufi saint of Bengal, Hazrat Alaul Haq Pandavi and established his own Sufi order (silsila) through his spiritual disciple Syed Shah Abdur Razzaq Nurul-Ain, the 11th direct descendant of the world renowned Sufi Sheikh Abdul Qadir Jilani. His shrine is still revered as great Sufi hospice and is known as “Aastana-e-Hazrat Jahangir Simnani” in Ambedkar Nagar, Uttar Pradesh.

The long and short is that Iranian-origin Indian Sufis fervently taught and promoted pacifism, spirituality and non-violence. As a result, the shrines of these saints are still attracting people from all faith traditions even after hundreds of years. In the current situation of growing religious hatred, faith-inspired terror and malice, the Indian and Iranian governments are reminded of these peace actors. It is indeed a welcome move.

A view is emerging in both the countries that the menace of extremism can be better wiped out from the region through the restoration of Rishi-Sufi tradition and propagation of its universal values. Not only the governments, but more of common citizens have developed this impression in their own ideological battle against the extremist thoughts and hardcore philosophies. I met a considerable number of Muslim youths in Iran who consider Islamic State an offshoot of radical Islamism, not just ‘a handiwork of the Jews’ a widespread perception in the global Muslim community. When asked how they try to rebut its ideology, they told me they seek to strengthen Islamic moderation through the doctrine of Mahdism, an Islamic belief in the awaited messiah or spiritual savior of the world from the clutches of the evils.

Iranian Muslims in general are Shiites and, hence, venerate the fourth caliph of Islam, Hazrat Ali as their supreme spiritual leader. He was assassinated by the Kharijites, the first terrorist faction in Islamic history. They indulged in violent takfirism, declaring others kafir [infidel] and thus legitimizing their killings. With the commencement of the 19th century, many new-born Kharijites emerged in the Middle East and took roots in the wider Asian region. They started anti-Sufism and anti-Shia movements with an aim to fan the fire of sectarianism and thus giving rise to extremism among Muslims. The ideology of Kharjiites which basically originated in the time of Hazrat Ali was later propagated among people on the grounds of misinterpreted and seemingly militant Qur’anic verses.

In this entire duration, spiritually inclined masters of the community, the Sufis, remained confined to their conclaves in holy shrines and hospices. As a result, particular fractions of religionists began to adopt theoretical extremism, religious bigotry, takfirism and justification of wanton killings. This is the Kharijite ideology which is now playing havoc across the world and the Middle East in particular.
It is indeed gratifying to note that the two peace-loving countries, India and Iran, with their ancient civilizational and cultural linkages, are on the lookout for an acute anti-extremism alliance. While India has been ideologically fighting the Islamic State on its soil, Iran has been the most proactive Muslim country in breaking terror’s back. Tehran has already committed its military and weaponry in Iraq, offering Baghdad its unconditional support against the self-imposed Islamic caliphate, Daesh’s atrocities.

Since Iran is a Shia-majority country and Daesh is ideologically anti-Shia, it has killed thousands of Shias considering them kafir (infidel). After its expansion in Iraq only kilometers away from Iranian western borders, Islamic State became the biggest threat to the Shia Muslims of Iran. Therefore, Iran has been actively engaged in an ideological battle against the radicalism since the beginning of Syrian Civil War in 2011. It was the first Muslim country to provide assistance to Iraqi and Syrian regimes to fight Islamic State, deploying its troops in the two countries. It is still combating the takfirist terrorists of Islamic State in both Iraq and Syria. The Iranian Quds Force played pivotal role in military intervention against the Daesh. Al Jazeera once reported that hundreds Iranian Sunni Kurds crossed the Iran-Iraq border to fight Islamic State in January 2015.

As a result of its effective anti-terror strategy, the Jihadists of Islamic State, despite having their strong base in the close neighborhood, in Iraq and Syria, have not yet succeeded in Iran. Various research works and polls have shown that Islamic State got no recruitments from the Iranian Muslim society, not even from the Sunni community of Iran. At this juncture, we are amazed at the naivety of our anti-terror Indian establishments that could not prevent a few Indian Muslim youths from travelling to Iraq and Syria and joining the Islamic State.

While signing the 12 new agreements, India and Iran have also decided to jointly combat cyber crime to weaken the terror networks and radical recruiters. As the two strategic partners in counter-extremism, India and Iran can fiercely battle the online radical indoctrination. In fact, we have contagious cyber threat against peace, pluralism religious diversity in India. This forms the bedrock for the extremists’ recruitment of Indian youth. Growing cyber radicalisation and terrorists’ recruitments on social media are still unrestrained. Young and naive Muslims with impressionable minds are still being drawn into extremism through different online channels. Seductive messages in the disguise of Islamic exhortations easily catch the imagination of the young netizens in Indian subcontinent like in the Middle East, US and Europe. Inspired by the neo-Kharijite extremist ideology, a few Indian Muslim youths traveled to the Middle East, particularly in Iraq and Syria, for terrorist training that was meant to bring the cancer of radicalism back home. In this grim situation, the Indo-Iranian joint efforts to counter the cyber radicalization will be a panacea for this ill.

Ghulam Rasool Dehlvi is a scholar of Comparative Religion & Classical Islamic sciences, cultural analyst and Doctoral Research Scholar at Centre for Culture, Media & Governance (JMI Central University).

 

http://www.firstpost.com/world/india-and-iran-how-the-two-ancient-civilizations-can-curb-radicalism-2808348.html

World Sufi Forum: How Sufism runs as a counter to hardline ideologies?: First Post

Mar 17, 2016 15:42 IST

 By Ghulam Rasool Dehlvi

  • In an article published in The Guardian dated, 23 October 2014, Jason Webster explained how Sufism runs as ‘a natural antidote to fanaticism’. Sufism-inspired discourses on peacemaking and counter-extremism and deradicalisation have created interesting debates, enlarging the ambit of modern approaches to peace, pluralism and non-violence. Obviously, a Sufi is not much of a social scientist or a strategist, the pluralistic Sufi concepts and mystically-inclined Islamic narratives of peace and counter-extremism are worth deliberating.

    In 2003, Stephen Schwartz wrote a groundbreaking book “Two Faces Of Islam: Saudi Fundamentalism and Its Role in Terrorism” in which he explained that Sufism is a “mystical branch” of Islam- the second largest religion of the world which has been conflated in sections of the media and academia, over a period of time, with violent extremism, exclusivism, puritanical fundamentalism, xenophobia and religo-facism. Given this, he hypothesised that an objective analysis of the mystical narrative of peace and counter-extremism and its ideological underpinnings in Islam will trigger   an avid interest both in media and academia.

    In the wake of the 9/11 bombings, a considerable corpus of literate was devoted to explain how peculiar and idiosyncratic elements of religion can motivate both violence and non-violence. Scholars well-versed in the sociology of world religions reproduced holistic analyses of the different, vibrant and myriad spiritual theories of peace and non-violence that emanate from the mystical interpretations of all religions. In the case of Islam, Sufism emerged as the spiritually-inclined version of faith helping in peacemaking and eradicating violence and extremism. Case studies of different religions and populations of faith adherents have been examined as practical applications of religions’ spiritual resources for counter-extremism.

    On the contrary, the radical Islamist ideologues of the sectarian hue worked out a complete theology of anti-pluralism seeking to justify extremist thoughts and actions, sectarian conflicts, faith-inspired violence, wanton killing of civilians and suicide-bombing.

    Representational image. AFP

    Representational image. AFP

    In this backdrop, a rational and consistent narrative of peace and counter-extremism within an Islamic framework was called for. Therefore, noted Sufi scholars, not only in India but across the rest of the world brainstormed ways to tackle the onslaught of religious extremism catching the imagination of many young Muslim practitioners. In a bid to refute extremism on ideological grounds, they articulated a Sufism-inspired approach to peace and de-radicalization of the vulnerable sections of society. Thus, an Islam-based Sufi narrative of peace, counter-extremism and de-radicalization grounded in refutation of the extremist underpinnings was laid down.

    The first research-based Sufi activism in this ideological field can be traced back to the post-9/11 outburst of views and debates on khilafah (caliphate), jihadism, hijrah (migration to lands of Islam), hakimiyah (divine rule on the earth) and other drives of religious extremism propounded by the radical Wahhabism. Since then, Sufi leaders and scholars have been seen in the global media as well as academia countering the violent extremism, intolerance, xenophobia, religio-fascism and other supremacist and exclusivist thoughts.

    Remarkably, the first focus on this energetic facet of Sufism was carried out by Idries Shah around 50 year ago. Entitled “The Sufis”, his book had the renowned western writer Robert Graves writing a foreword for it. It was praised as “a seminal book of the century” by The Washington Post. Since then, much of the work on the similar lines has been carried out.

    Of late, rigorous Sufi activism aimed at finding concrete counterpoints to extremism has been geared up in the Middle East, Europe and America, South Asia and other parts of the world. A considerable number of seminal research works on this subject have been accomplished in many peer-reviewed academic journals. Equally important is the increasing number of books and monographs on these themes as produced in the academic arena.

    A recently-published book “State and Nation-Building in Pakistan: Beyond Islam and Security” mentioned that the former Pakistani President, Pervez Musharraf needed to reinforce Sufi liberal attitudes to mitigate the sectarian conflicts in the country. “He (Musharraf) launched the concept of Enlightened Moderation at the 2002 Organization of the Islamic Conference meeting in Malaysia and emphasized Sufi teachings as a counter to extremism. In November 2006, he launched a National Sufi Council amidst great fanfare”. Government efforts ensured that the Sufi-oriented religious scholars of the Pakistani Education Board, Tanzimul Madaris discourage and rebut the twisted ideas leading to acts of terror and suicide bombing.

    Until recently, Sufi Islam was not fashionable for many Pakistani Muslims. Rather, it was shunned not only by the upper class, government, military, and bureaucrats but also by academic and intellectual circles. But a reversing viewpoint is emerging now. Both academicians and bureaucrats are beginning to actively support Sufism as a much more tolerant version of Islam that can better equip them ‘to counter the rise of Islamic extremism in Pakistan’.

    A ground-breaking work entitled “Re-Appropriating Sufi Authorship in New Media” clearly asserts that “Different factions of upper- and upper-middle-class Pakistani society-including politicians, intellectuals, filmmakers, and celebrities-have joined together to raise their voices in opposition to the extremist threat by reaffirming Sufism” (Cynthia Chris, David A. Gerstner, 2013).

    At a time when Muslims are faced with the present-day cancer of growing sectarianism looming large in the global Islamic societies, Sufism is looked up to as a panacea for these ills.

    Taliban, Al Qaeda, ISIS and all other terrorist organizations and un-Islamic elements have destroyed the brotherhood of mankind that was once established by the Sufi hospices. They go to the extent of brutal and bloodthirsty massacre of common civilians and non-combatant innocent Muslims as in Iraq and Syria in particular. At this juncture, Sufism comes as a rescue to the oppressed, because it rejects all extremist ideas and actions outright. Sufis were vehemently opposed to the brazen violation of human rights enshrined in Islam and exhorted the Muslim youth to shun takfiri indoctrination and wrong interpretations of the Quran and Hadith that go against the consensus of the Ummah. Even today, they denounce- in the harshest words- the wanton killing of civilians, destruction of property and wealth, rebellion against the government, accusing Muslims of kufr (Takfirism), demolition of shrines on both local and global levels. In clear and categorical words, it rebutted all intellectual, social, religious, political and economic or ideological terrorism.

    While affirming the importance and the need of reviving Sufism, there is greater need to inculcate universal and egalitarian values-brotherhood of humankind, compassion, acceptance and tolerance, social affinity and national harmony. This is impossible in the Muslim society without promoting the tolerant, spiritual and moderate version of Islam.

However, the Sufi divines would do a great help to Indian Muslims if they do not merely reiterate “reformist Sufism” in the name of revival of Sufism. They need to support the non-conformist form of Sufism which is in full accordance with the universal prophetic traditions and in complete synergy with the spiritual and saintly righteous Muslims. We never endorse ignorance or illiteracy in the name of Sufism. Anything in the name of Sufism that doesn’t reflect itself in accordance with the Quran and Sunnah is null and void. Therefore, along with the revivalist Sufism, we strive to stress the need for the reformist Sufism.Going by history, this is an eternal fact that Islam in India owes much of its existence to Sufi Mashaikh, Saints and Dervishes. In the 13th century, Khwaja Ghareeb Nawaz came to India and his arrival in India is regarded a great milestone in the path of love, equality, spirituality and peaceful Dawah work.

Hazrat Khwaja Ghareeb Nawaz (r.a) pioneered the composite culture in India which still remains well-spirited, widely accepted and appreciated by the majority of Indian people. After Khwaja Ghareeb Nawaz, Khwaja Qutbuddin Bhaktiyar Kaki, Baba Farid, Khwaja Nizamuddin Auliya, Makhdum Sayed Ashraf Jahangir Simnani and Ameer Khusro took this cause of eternal salvation ahead. They devotedly taught and promoted unconditional love, peace and all-embracing spirituality. Mere the reality that the shrines of these saints are still captivating people from all faith traditions, even after 800 years is self-explanatory that Sufism is a vital help in the current situation of hatred and malice.

In the backdrop of this, modern Sufis have come all out of their conclaves and hospices. They are declaring that the evils of ideological terrorism and extremism, materialism and opportunism can only be wiped out from the society through the restoration of Sufism, propagation of its peaceful massages, humane nature helping in the cessation of extremist thoughts and hardcore philosophies.

On the other hand, many anti-Sufism movements reared their head in the Muslim societies in the 19th century. They began to disparage Sufis as pseudo-Islamic spiritual masters. Though pacifist by nature, some well-spirited and energetic Sufis retorted this accusation calling it a tide of ideological extremism deep-rooted in the Muslim history. They link it with the ideology of Kharjism which basically emerged in the caliphate of Hazrat Ali (r.a), and was propagated among the Muslim fringes on the pretext of Qur’an and hadith, Prophetic sayings. In this beginning, Sufi divines remained confined to their shrines. As a result, particular Islamsit factions started adopting extremism, hatred, takfirism and wanton killing. This is, they view, is something that has brought the wider Muslim world and Middle East in particular to a grim and gory situation.

World Sufi Forum is going to begin in New Delhi at 7 pm on Thursday and Prime Minister Narendra Modi is scheduled to begin his speech at around 7.30 pm

Photographs from World Sufi Forum:17-20 March 2016

10347081_1109544639076238_5486837036986406483_n
10398996_1109546432409392_8170228559478639214_n
10422319_1111908642173171_7049232563432849135_n
11059866_1265383636824290_6845258786735091385_n
11217558_1111916568839045_6810247115342239297_n
12038364_1267193313309989_3065863221407710509_n
12039762_1265389933490327_7998651375695831062_n
12049356_1267399819956005_3612603431406460882_n
12105722_1111723038858398_2169317638157195745_n
12105722_1111732788857423_3698773842671657497_n
12321196_1111924188838283_1587219026790021707_n
12321204_1109544052409630_4005515810331074492_n
12321336_1111922255505143_7662303436728081747_n
12321498_1111918785505490_1507473836832522857_n
12321677_1109544149076287_5612250251042094259_n
12321679_1109439562420079_8376901944526837756_n
12321696_1267190603310260_4108370083157055099_n
12376357_1267399856622668_4956925824876930970_n
12400672_1109540779076624_1690365916451079947_n
12417531_1267398169956170_4142746432125867894_n
12417543_1109440045753364_392321053996436340_n
12417729_1267181376644516_7492128612810941427_n
12417785_1111735115523857_8150914942018186431_n
12418047_1111915958839106_3446844880968045057_n
12472362_1267398556622798_4171864271972901771_n
12472369_1111909165506452_8749067387947120408_n
12472568_1267403783288942_6444892972186706149_n
12472581_1267401556622498_3590748525470967802_n
12472724_1111909475506421_3376208400933228541_n
12472803_1111908952173140_2000984664794962895_n
12494693_1111913995505969_3131042857703907108_n
12494861_1109440052420030_5292428471370786651_n
12495147_1111930865504282_5089947902538676788_n
12512245_1109543545743014_4225262864951012809_n
12512348_1111723952191640_8147116366730671481_n
12523974_1111926405504728_5976944544704550549_n
12523983_1111911115506257_5765674998013819275_n
12592625_1109546032409432_3718054791146055717_n
12670544_1111910445506324_5679440326943764994_n
12670644_1111731255524243_6048669721264809992_n
12670648_1109543462409689_4164152878919055515_n
12670660_1111921175505251_5235221192126052795_n
12670684_1111927285504640_5336016675082862239_n
12670756_1109440099086692_7745385550438634268_n
12670896_1111917452172290_2399818367281472417_n
12671719_1265390183490302_3491369931995722953_o
12705630_1267396703289650_671534399973333338_n
12800272_1267182023311118_2642165858457198781_n
12801538_1267396886622965_1217548302416156429_n
12801548_1265389473490373_5384885466673711115_n
12801550_1111722032191832_1174894925951631800_n
12801574_1111909728839729_6416295952338205858_n
12801629_1111912172172818_891280849266757382_n
12803273_1265389570157030_4724673126241369225_n
12885978_1111721165525252_5089690506053720983_o
12919639_1111916468839055_5691280695680629467_n
12919697_1111927335504635_8537116879842241733_n
12919756_1109440272420008_2289363396139359854_n
12919845_1265377500158237_3768125138651895540_n
12919874_1111981852165850_1661184721548727510_n
12920271_1109543599076342_6659463680617990392_n
12920275_1267190646643589_1721602387382488339_n
12920340_1267181759977811_360557180905791269_n
12920355_1111723245525044_2163351531470038641_n
12920359_1111726812191354_4593184301204433431_n
12920420_1111921028838599_5098755907307913627_n
12923083_1267403076622346_7184580880112904841_n
12923211_1109440239086678_5070113925055367339_n
12923273_1109544722409563_8688468742470887008_n
12923306_1267398479956139_4383268532436905453_n
12923388_1265385853490735_973620952298340499_n
12924402_1111927558837946_4676274328426521035_n (1)
12924425_1109546279076074_1085383935502906622_n
12928202_1109439572420078_1480761403687394134_n
12928203_1109544575742911_4464703123646137865_n
12928230_1267193403309980_7994119627961063773_n
12928281_1265377033491617_3398690181303478765_n
12928291_1111909802173055_5759350165115767627_n
12928392_1109440002420035_1672954318107401209_n
12931008_1111914555505913_5815119313231094508_n
12931197_1267398433289477_6838496532576793475_n
12931217_1111722832191752_5675060173914892466_n
12931241_1111728362191199_7041205648552566042_n
12932637_1267403696622284_364607608078153977_n
12932729_1111733752190660_575650433107217290_n
12932793_1267193129976674_2483885475519038919_n
12933066_1267402099955777_4262771542335344168_n
12933163_1111922042171831_887786246841895214_n
12936630_1267191186643535_3529208920668425790_n
12936724_1111728792191156_5601479350188773392_n
12938115_1111926185504750_2599355959683930753_n
12938173_1111922468838455_938365898796393248_n
12938186_1111910822172953_883612408715555665_n
IMG-20150531-WA0028
13001294_1030714190341200_6277686903408727845_n
12963524_833634153408115_452751396191705893_n
12936721_1134780559889521_5517746289344697125_n
12924425_1134780279889549_5274092146356831346_n
12932716_1134780259889551_2778864134523336853_n
12932762_1135187789848798_122177159908351324_n
12928224_1136590179708559_8261018048423425933_n
12400990_10154065706869049_8947776172447971084_n
156073_1256050797757574_7938361157029764332_n
10402862_1256050794424241_8667969038866732559_n
1915852_1256050731090914_7507723619850829049_n
8325e938-b53a-4390-8e7d-e5845a42eae9
12512242_10153268178786735_8251464789229096575_n
12803259_10153550836489211_518891476724474301_n
12814350_1155868987787211_3166977775221291302_n
6165_1155868664453910_3966116894637999923_n
IMG_20160318_021157
20160313133014 (2)
DSC_6374
DSC_6375
DSC_6377
DSC_6379
DSC_6380
405_1109440429086659_8086880055035711579_n
5669_1267192853310035_8240175264057294648_n
6788_1265384193490901_5606638703342036221_n
7666_1265389736823680_1492982302423502645_n
934146_1109540285743340_3287950881485391145_n
940916_1111728885524480_5004518365351731316_n
943860_1267181753311145_2487150649359563910_n
944004_1109544212409614_8278897078190883378_n
944910_1109540329076669_6601346702740344044_n
946451_1109440365753332_9215004395818652754_n
1001122_1265389520157035_1271452550873606704_n
1235485_1109540015743367_6820651262362632108_n
1517678_1267191153310205_34831561290703320_n
1655944_1109439595753409_8927783138238138475_n
1916383_1265376726824981_6650996910875604540_n
1918306_1109540332410002_4234046994150096240_n
1934661_1267191426643511_1792777873199634470_n
1934743_1109439782420057_6171076024824552026_n
1934743_1109540839076618_4057618611435491545_n