आल इंडिया उलमा व माशाइख बोर्ड की हंगामी जिला समन्वय मीटिंग तेलंगाना में संपन्न।

22 सितंबर , वनापर्ती तेलंगाना,
आल इंडिया उलमा माशाइख बोर्ड तेलंगाना शाखा की जिला समन्वकों की हंगामी मीटिंग तेलंगाना प्रदेश के अध्यक्ष हज़रत सय्यद आले मुस्तफा पाशा अल जिलानी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। इस मीटिंग में तेलंगाना राज्य के लगभग सभी जिलों से माशाइख,उलमा व मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया।
मीटिंग में जहां बोर्ड के कार्यों के संबंध में लोगों को बताया गया वहीं बोर्ड की नीतियों एवं कार्यक्रमों की जानकारी दी गई साथ ही इस समय देश एवं दुनिया में चल रहे बड़े घटनाक्रमों पर भी विस्तृत चर्चा की गई, इसमें जहां तीन तलाक़ बिल पर बात हुई वहीं मौजूदा समय में कश्मीर समस्या पर भी लोगों ने अपने विचार रखे मोब्लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी क़दम पर चर्चा हुई।

इस मौके पर बोलते हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मौलाना सय्यद आले मुस्तफा पाशा अल जिलानी ने कहा कि यह वक़्त ज़िम्मेदारी को महसूस कर उसे निभाने का है न कि इससे मुंह चुराने का क्योंकि हम सब सूफिया के चाहने वाले हैं लिहाज़ा हमारा काम घटती हुई मोहब्बत को बढ़ा देना है ताकि कोई चाह कर भी हमसे नफरत न कर सके।

मौलाना ने कहा कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है लेकिन सिर्फ कश्मीर की ज़मीन नहीं बल्कि कश्मीर के लोग भी हमारे हैं लिहाज़ा सरकार को लोगों में विश्वास बहाल करने की ओर निर्णायक क़दम उठाने चाहिए क्योंकि हालात इंटरनेट बंद कर देने या कर्फ़्यू लगा देने से सही होने वाले नहीं इसके लिए लोगों में विश्वास पैदा करना होगा।ताज़ा यमन और सऊदी अरब का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया में अशांति बढ़ रही है और देश युद्ध की ओर रुझान कर सकते हैं अगर ऐसा होता है तो नुकसान सभी को होगा लिहाज़ा हमारा काम है कि लोगों को मोहब्बत का पाठ पढ़ाया जाए।

पाशा ने माशाइख़ का आह्वाहन किया कि वह खानक़ाहों से बाहर निकलकर बढ़ती हुई नफरत को मोहब्बत में बदलने का काम करें अगर अभी भी ऐसा नहीं हुआ तो यह चमन जल जायेगा जिसे बचाना हम सब की ज़िम्मेदारी है। बैठक में बड़ी तादाद में उलमा बुद्धिजीवियों और मशाइख़ ने शिरकत की, नगर कुरनूल,गढ़वाल एवं अचंपेट जिलों से लोगों ने शिरकत की। मीटिंग में तय हुआ कि तेजी से बोर्ड के सदस्य बनाए जाने का कार्य शुरू किया जाए जिसके लिए बड़ा सदस्यता अभियान चलाया जाए।

By: यूनुस मोहानी

AIUMB Joint Secretary Haji Syed Salman Chishty leads students in Discussion on Kashmir at University of Geneva

Geneva (20 September, 2019)
Friday evening in a lecture room at the University of Geneva, a crowd of students and interested community members welcomed Haji Syed Salman Chishty, Joint Secretary at All India Ulama & Mashaikh Board (An apex body of Sunni Sufi Muslims in India) and the 26th Generation, the hereditary custodian and key holder of the renowned Dargah Ajmer Sharif Sufi shrine. The shrine, located in Rajasthan state’s city of Ajmer, is esteemed by devotees from many communities as it is the burial place of the revered Sufi said Moinuddin Chishti who was known for his charisma and compassion as a spiritual preacher and teacher.


At topic was the current situation in Jammu and Kashmir (J&K), which has been ever-present on the new scene since the beginning of August this year, when Prime Minister of India Narendra Modi approved the revocation of Article 370 in Parliament. That constitutional provision had given Kashmir a special status but ironically also restricted the social and economic. Haji Syed Salman Chishti began the discussion with a declaration of peace over the gathered crowd.

He then heralded the rich, spiritual history of J&K, specifically detailing how closely intertwined it is with the upbringing he enjoyed in his own hometown. Speaking on Kashmir, he referred to the land as one “known for its wisdom, respect for humanity, and commitment to upholding the highest principles of human family and human rights.”

Prior to colonial times, there was no “consciousness of ‘us’ and ‘them,’” he said, referring to the unrest currently impacting anyone who lives in or has ties to Kashmir. Before, inclusivity was the norm and reflected what he called the “composite culture of the people living across multiple regions of India.” But today, he went on, “Extremist ideology [has been used] as part of enhancing and extending the proxy disturbances” of Pakistan’s “cross-border terrorism” in Kashmir.

That is why, according toChishty, “On the 5th of August, the government of India went ahead and made a very bold decision to take away a temporary provision known as Article 370, which had given a sense only of superficial security [to Kashmir]. The stipulation was only provisional, according to the esteemed guest, and was meant to be short-lived.

Going forward, Haji Syed Salman Chishty expressed a wish for dialogue to continue. The youth in particular, he emphasized, should be integral actors in discussions, negotiations, and peace movements as they are the ones who will lead future generations in Kashmir and beyond. “These voices will not only be heard across India,” he declared, “but they will make a mark globally.”

He further expressed that Openness, integration, and newfound opportunities that could not previously be reached because of the forces of hate, fear, and division have become attainable with the revocation of Article 370. It is the duty of every Indian to stand together with each Kashmiri. In his words, “India is a land where everyone can not only see but experience freedom of religious expression; the constitution of India gives this right.”

Closing the conference, he recited the words to a well-known saying from Mughal Emperor Jehangir when he visited Kashmir in the 17th century: “Gar firdaus bar-rue zamin ast, hammin asto, hamin ast.”

“If there is paradise on earth anywhere it is here, it is here, it is here.”

वसीम रिज़वी की गिरफ्तारी को लेकर आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड की राष्ट्रपति से गुहार

12 Sept, 2019 महाराजगंज
आल इंडिया उलमा व मशाइख़ बोर्ड की महराजगंज शाखा ने महामहिम राष्ट्रपति को जिलाधिकारी महराजगंज के माध्यम से शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन एवं विवादित फिल्म (आयशा द मदर ऑफ बिलीवर्स) के निर्माता वसीम रिज़वी के विरूद्ध सख्त कानूनी कार्यवाही किए जाने की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा। बोर्ड के महाराजगंज यूनिट द्वारा 6 सूत्रीय ज्ञापन दिया गया जिसमें वसीम रिज़वी द्वारा निर्मित दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को आहत पहुंचाने वाली फिल्म को भारतीय सेंसर बोर्ड द्वारा मंजूरी न दिए जाने की मांग की गई। साथ ही फिल्म के निर्माता के उद्देश्य की जांच करवाने एवं इस फिल्म के निर्माण के लिए पैसा कहां से आया इस बात की जांच करवाने की मांग की गई। बोर्ड के लोगों का मानना है कि इस फिल्म के निर्माण में किसी आतंकी संगठन का पैसा लगा है या फिर किसी विदेशी साजिशकर्ता का क्योंकि इस फिल्म का उद्देश्य लोगों में नफरत पैदा कर देश में अशांति फैलाना है।क्योंकि यह फिल्म भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा से बाहर जाकर समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से बनी है।

अतः इसकी रिलीज़ पर तत्काल रोक अति आवश्यक है। यह हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा का मामला है। इससे पहले बोर्ड की महाराजगंज शाखा द्वारा बीते शुक्रवार को इस फिल्म के विरूद्ध प्रदर्शन किया गया और हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। जिलाधिकारी से मिलने गए प्रतिनिधिमंडल द्वारा जिलाधिकारी को ज्ञापन के साथ हस्ताक्षरित बैनर भी सौंपा गया जिसे जिलाधिकारी महोदय द्वारा महामहिम राष्ट्रपति महोदय को प्रेषित किया जाएगा। प्रतिनिधिमंडल में सय्यद अफजाल, मौलाना बरकत हुसैन, मौलाना अब्दुल्ला, मौलाना कमरे आलम, आज़ाद अशरफी, इद्रीस खान अशरफी, महताब आलम, डॉक्टर नेहाल, महबूब आलम, शमीम अशरफी आदि शामिल रहे।

آل انڈیا علما و مشائخ بورڈ صدر دفتر میں ذکر شہدائے کربلا

شہادت حسین ؓ کا مقصد نظام عدل و انصاف کو قائم کرنا: محمد حسین شیرانی
(ستمبر11،نئی دہلی (پریس ریلیز)
شہادت حسین ؓ کے مقصود کو سمجھیں تو معلوم ہوگا کہ آپ کا مقصدکتاب و سنت کے قانون کو صحیح طور پر رواج دینا، نظام عدل و انصاف کو قائم کرنا، حق کے مقابلہ میں باطل سے نہ ڈرنا، خوف و ہراس اور مصیبت و مشقت میں نہ گھبرانا اور ہر وقت اپنے مالک حقیقی کو یاد رکھنا اور اسی پر توکل اور ہر حال میں خداکا شکر ادا کرناتھا، ان مقاصد کو آج ملت فراموش کر چکی ہے جس کی وجہ سے تاریکی میں پھنستی جا رہی ہے۔ ہمیں چاہئے کہ ہم شہادت حسین ؓ کے مقصود کو سمجھیں، اس سے پیغام حاصل کریں اور تاریک زندگیوں کو روشن و منور کریں۔ان خیالات کا اظہار محمد حسین شیرانی نے کیا۔
محمد عظیم اشرف نے کہا کہ امام عالی مقام حضرت امام حسینؓ کی شہادت تاریخ کا ایک الم ناک حادثہ ہے جسے امت کبھی فراموش نہیں کر سکتی، صدیاں گزرنے کے بعد بھی شہادت کربلا لوگوں کو یاد ہے لیکن حقیقت یہ ہے کہ اس عظیم شہادت کے باوجود آج امت نے امام عالی مقام کی قربانیوں اور مقصود شہادت کو فراموش کر دیا ہے، دین اور نبوی تعلیمات کے لئے جو نا قابل فراموش کارنامہ امام عالی مقام اور آپ کے مبارک خاندان نے انجام دیا اس کو نظر انداز کر دیاجس کی وجہ سے ملت خسارے میں ہے۔
محفل میں حافظ محمد قمرالدین نے منقبت پیش کی، محمد اشرف ایس، محمد جنید، صدام حسین،طفیل احمد،حسنین خان،محمد شعیب، توصیف،شاداب اور الفیض وغیرہ نے شرکت کی، محفل کا اختتام صلوٰہ وسلام،فاتحہ خوانی اور ملک میں امن و امان کی دعا کے ساتھ ہوا۔

By: Husain Sherani

हुसैन का ज़िक्र ज़ुल्म और भ्रष्टाचार का इलाज है : सय्यद मोहम्मद अशरफ

9 सितंबर, रायपुर छत्तीसगढ़
आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड के अध्यक्ष एवं वर्ल्ड सूफी फोरम के चेयरमैन हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने एक धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हुसैन का ज़िक्र ज़ुल्म एवम भ्रष्टाचार का इलाज है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में जहां भी ज़ुल्म है कुप्रबंधन है नाइंसाफी है वहां हुसैन का ज़िक्र उसके खिलाफ आवाज है,क्योंकि रसूले अकरम सल्लललाहू अलैहि वसल्लम के नवासे ने अपने 6 माह के बेटे से लेकर अपने पूरे घर की कुर्बानी इस ज़ुल्म और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में दी और आने वाली दुनिया को यह संदेश दिया कि अगर कहीं ज़ुल्म और नाइंसाफी हो भ्रष्टाचार हो तो उसके खिलाफ बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
हज़रत ने कहा कि जिस तरह की जंग करबला में इमाम ने लड़ी उसकी मिसाल पूरी इंसानी तारीख में नहीं मिलती जहां वफादारी ने भी अपने कमाल को छुआ यह वाहिद जंग है जिसमें मैदान में सर कटाने वाला जीता और क़ातिल बुरी तरह हार गया । अली के बेटों ने करबला के तपते रेगिस्तान में भूके और प्यासे रहते हुए जो इबारत लिखी उससे रहती दुनिया तक लोग हौसला पाते रहेंगे।
करबला सिर्फ जंग नहीं है बल्कि एक पैगाम है कि ज़ुल्म को बर्दाश्त करना भी ज़ुल्म है इसीलिए हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि ज़ुल्म के खिलाफ जितनी देरी से खड़े होंगे कुर्बानी उतनी ज़्यादा देनी होगी,लिहाजा हम सब मोहर्रम में इमाम का ज़िक्र इसलिए करते हैं कि हम ज़ुल्म करने वाले नहीं बल्कि ज़ालिम के विरोधी हैं भ्रष्टाचार के नाइंसाफी के विरोधी है। मोहर्रम दुनिया में ज़ुल्म के खिलाफ अमन वालों के प्रदर्शन का नाम है।

By: Yunus Mohani

1 सितम्बर 2019 से 15 अक्टूबर 2019 तक मतदाता सूची का पुनरीक्षण

आल इंडिया उलमा व मशाइख बोर्ड की अवाम से अपील !!

आल इंडिया उलमा व मशाइख बोर्ड लोगों से अपील करता है कि देश में भारत का निर्वाचन आयोग 1 सितम्बर 2019 से 15 अक्टूबर 2018 तक मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर रहा है जिसमे जिन लोगों के नाम गलत लिख गए हैं कई जगह पिता का नाम गलत लिख गया है इस तरह कि त्रुटियों को सही किया जा रहा है साथ ही नए वोटर भी जोड़े जा रहे हैं .
आल इंडिया उलमा व मशाइख बोर्ड सभी से अपील करता है कि जो भी लोग 18 साल के हैं या उससे ज़्यादा है या फिर 2020 तक 18 वर्ष के हो जायेंगे और उनके नाम अगर मतदाता सूची में नहीं हैं तो वह अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वाँ लें.सिर्फ यही नहीं बोर्ड ये भी अपील करता है ख़ास तौर पर मुसलमानों से क्योंकि कागज़ी कार्यवाहियों में कौम पिछड़ी हुई है लिहाज़ा वह अपने सभी वैध दस्तावेज़ बनवा लें जैसे आधार कार्ड , अगर ज़रूरी हो तो ,पैन कार्ड , ड्राइविंग लाइसेंस ताकि आपको किसी भी प्रकार से कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़े .बोर्ड अपने सभी ज़िम्मेदारों से अपील करता है कि वह जगह जगह कैंप लगा कर जिन लोगों के नाम शामिल नहीं हैं या गलत हैं उनके नाम मतदाता सूची में शामिल करवाने में मदद करें अपने बूथ की लिस्ट में देखें किन लोगों के नाम नहीं हैं उनके फार्म भरवाएं अगर बी एल ओ या अन्य कोई अधिकारी आपकी सही बात नहीं सुनता तो आल इंडिया उलमा व मशाइख बोर्ड के लेटरपैड पर उच्च अधिकारीयों को उसकी जानकारी दें और बोर्ड के केन्द्रीय कार्यालय को भी इसकी सूचना दें.क्योंकि लोकतंत्र में मताधिकार सबसे अहम् अधिकार है आप बिना मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करवाये अपने इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते .लोगों में इसके लिए जागरूकता लायें .लोगों को इसकी जानकारी देने के लिए सोशल मीडिया के ज़रिये या हैण्ड बिल ,या पर्चे छपवाकर बांटे साथ ही जुमा की नमाज़ में भी इसका एलान किया जाये.

वसीम रिज़वी के खिलाफ ऑल इंडिया उलमा व मशाइख़ बोर्ड का विरोध प्रदर्शन

6 सितम्बर, 2019(महराजगंज:नौतनवा)
शुक्रवार को स्थानीय कस्बे के परसोहिया मोहल्ले में स्थित अशरफी जामा मस्जिद के बाहर आल इंडिया उलमा व मशाईख बोर्ड की जिला कार्यकारिणी द्वारा जुमा की नमाज़ के बाद वसीम रिज़वी द्वारा हज़रत आयशा (र.अ) पर फिल्म बनाकर गुस्ताखी के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया तथा जमकर विरोध प्रदर्शन किया गया। लोगों की मांग है कि देश की सरकार फौरन वसीम रिज़वी के विरूद्ध कार्यवाही करे और इसकी फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाए। वसीम रिज़वी की यह फिल्म जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे से निकलकर एक वर्ग विशेष की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की श्रेणी में है वहीं कानूनी रूप से अपराध है। उसका यह कृत देश में अशांति फैलाने का घिनौना प्रयास है। बोर्ड के महराजगंज के जिला अध्यक्ष मौलाना बरकत हुसैन मिस्बाही ने बताया कि इस संबंध में हस्ताक्षर युक्त बैनर सहित ज्ञापन जिलाधिकारी महोदय के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति जी को भेजा जाएगा। इस अवसर पर मुख्य रूप से हाफ़िज कलीमुल्लाह, मौलाना जुल्फेकार, महताब आलम, डॉक्टर नेहाल, फ़िरोज खान, शमसुद्दीन कुरैशी, साहबे आलम कुरैशी, मोहम्मद इद्रीस अशरफी, आज़ाद अशरफ क़ुरैशी, सरवरे आलम, शमसाद क़ुरैशी, मोहम्मद अनस अंसारी, गुलफ़ाम क़ुरैशी, नासिफ अंसारी, मोकररम, मोहम्मद इमरान खान, आज़ाद अशरफी, शमीमुद्दीन अशरफी, सरफराज अहमद समेत तमाम लोग उपस्थित रहे।

پروگرام میں دعوت دینے کے لیے جمعیۃ علماء ہند کا شکریہ، بحثیت قوم ہمیں خود احتسابی کی ضرورت: سید محمداشرف کچھوچھوی

دہلی:۵/اگست
ملک میں جاری ماب لنچنگ کے انسانیت سوز واقعات اور فرقہ پرستی کے بڑھتے قدم کو روکنے کے لیے جمعیۃ علماء ہند کے زیر اہتمام تالکٹورہ انڈوراسٹیڈیم نئی دہلی میں امن و یکتا سمیلن منعقد ہوا جس میں ہند و، مسلم، سکھ، عیسائی سمیت تمام مذاہب و مسالک کے رہنماؤں نے شرکت کی.
آل انڈیا علماء و مشائخ بورڈ کے بانی و صدر اور ورلڈ صوفی فورم کے چیئرمین حضرت سید محمد اشرف کچھوچھوی نے پروگرام میں دعوت کے لیے جمعیۃ علماء ہند کا شکر یہ ادا۔ انھوں نے کہا کہ اسلام سلامتی اور خیرخواہی کا درس دیتا ہے۔ ہمارے رسول صلی اللہ علیہ وسلم کی سیر ت موجود ہے کہ آپ نے کس طرح اپنے دشمنوں کے ساتھ خیر خواہی کا معاملہ پیش کیا.

انہوں نے کہا کہ ماب لنچنگ کے خلاف موثر قانون بنایا جائے. مذہب، ذات پات، رنگ و نسل، زبان اور فرقوں کی بنیاد پر بانٹنے والے ملک اور قوم کے بدترین دشمن ہیں.

Prof. Khwaja Ekram at AIUMB’s conclave: “Muslims never lagged behind in sacrificing their life for the country” WordForPeace Special Correspondent

New Delhi: 25 August

The one-day seminar organized by All India Ulama and Mashaikh Board at Delhi’s Ghalib Academy on the theme “Participation of Muslims in the creation and development of India” successfully concluded with the remarkable message from the Chief Guest, Professor Khwaja Mohammad Ikramuddin of Jawaharlal Nehru University, Delhi. He said: “Muslims never lagged behind in sacrificing their life for the country from Tipu Sultan to Birgedier Veer Abdul Hameed and ever since, Muslims have been in the front in giving life and wealth for the country”. Speaking on the core subject of Muslims’ participation in the freedom movement, he said that, whether it was the first freedom struggle of 1857 or the 1947 Independence of India from the British rule, the sacrifices of Muslims along with Hindus and Sikhs appear in the first row.

Another JNU professor, Syed Akhtar Hussain was the distinguished guest at the seminar. He dwelt on the significance of Musaddas Haali, also known as “Musaddas e-madd o-Jazr e-Islam”. It gives a historical account of the rise and fall of the Islamic empire in the sub-continent. It also speaks about the Islamic empire at its best and worst and aims to forewarn the Muslims of the sub-continent, make them more aware of their past and help them learn from their forefathers’ mistakes.

In this event, scholars, ulema and researchers from across the capital participated and presented their research papers. The program was presided by Syed Farid Ahmed Nizami of Dargah Hazrat Nizamuddin Aulia.

Speaking at the seminar, Professor Khwaja Khwaja Mohammed Ikramuddin said that the success of the independence struggle was possible only when the whole country unitedly fought against the British with the same fervour. He further said, at that time, a great many Muslim ulema waged both intellectual and physical jihad against the British, after which scores of people came out of their comfort zones and fought against the colonisers. “The ulema did not just give the fatwa but also jumped straight into the freedom war, from Allama Fazle Haq Khairabadi, Mufti Inayatullah Kakorvi, Maulana Ali Jauhar to Maulana Hasrat Mohani. The Muslim freedom lovers everywhere were wearing shroud in the head against the British, and that is why the British rulers killed and crucified thousands of ulama and their bodies were seen on the trees on both sides of the road. He also said that Tipu Sultan, Bahadur Shah Zafar, and many other names like them cannot be removed from the history of India’s independence.

Highlighting the role of Muslim poets and philosophers in the Independence struggles, JNU Professor in the Urdu department, Syed Akhtar Hussain said that Urdu journalism’s herculean efforts are recorded in golden letters in the history of the Indian freedom movement. The honour to go to jail under the British Press Act against Indian journalists was also conferred upon a Maulana, an Urdu journalist who was named Maulana Hasrat Mohani. He was the first Indian journalist who was imprisoned under this Act, he said.

In this program, Maulna Zafaruddin Barkati Editor Monthly Kanzul Iman Delhi, Maulana Abdul Moeed Azhari Editor Naya Savera, Ghulam Rasool Dehlavi Research Scholar Jamia Milia Islamia, Maulana Maqbool Salik Misbahi, Maulana Mir Sayyed Wasim Ashraf Sadar of All India Sunni Mission etc. were also invited.

The program was moderated by Younus Mohani. Hafiz Mohammad Nizamuddin recited the Quran-e- Majeed, while Hafiz Qamruddin, Hafiz Mohammad Azim Ashraf, Rukhsar Fatima recited the Na’at-e- Rasool. Young girl students including Gulnaz, Muskan, Saima, Raunaq, Kaneez, Mansha, Jannatul Firdaus, Ghosia, Farha and Zia presented the Urdu national anthem (Tarana).

The AIUMB program coordinator Mr. Husain Sherani gave vote of thanks and at the end of the program, the Wali Ahad Sajjadanshin of Dargah Hazrat Nizamuddin Auliya prayed for the peace and prosperity of the country.

मुल्क के लिए जान देने में मुसलमान कभी पीछे नहीं रहे: प्रो. ख्वाजा मोहम्मद इकरामुद्दीन

नई दिल्ली: 25 अगस्त

आल इंडिया उलमा व मशायख बोर्ड के द्वारा एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन दिल्ली के ग़ालिब अकादमी में किया गया जिसका विषय “भारत के निर्माण व विकास में मुसलमानों की भागीदारी “था इस में देश भर से आये शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र पढ़ें.,सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी दिल्ली के प्रोफ़ेसर ख्वाजा मोहम्मद इकरामुद्दीन रहे, कार्यक्रम कि अध्यक्षता सय्यद फरीद अहमद निजामी, वली अहद सज्जादानशीन दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने की, सेमिनार में विशिष्ट अतिथि के रूप में जे एन यू के प्रोफेसर सय्यद अख्तर हुसैन रहे.

सेमिनार में बोलते हुए प्रोफ़ेसर ख्वाजा ख्वाजा मोहम्मद इकरामुद्दीन ने कहा कि जंगे आज़ादी की कामयाबी तभी मुमकिन थी जब पूरा देश एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ता और यही हुआ भी. उन्होंने कहा कि उस दौर में बड़े बड़े मुस्लिम उलमा ने अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद के फतवे दिये जिसके बाद लोग बाहर आये, उलमा ने सिर्फ फतवे नहीं दिए बल्कि खुद भी जंग में सीधे तौर पर कूदे, चाहे वह अल्लामा फजले हक खैराबादी हों या मुफ़्ती इनायतुल्लाह काकोरवी, जौहर बिरादरान हों या फिर मौलाना हसरत मोहानी, हर तरफ आज़ादी के दीवाने अंग्रेजों के खिलाफ सर पर कफन बांधे जंगे आज़ादी में थे, यही वजह थी कि हजारों उलमा को अंग्रेजों ने सड़क के किनारे एक साथ सूली पर चढ़ा दिया और सड़क के दोनों किनारे पर मौजूद पेड़ों पर उलमा की लाशें नज़र आयीं.

उन्होंने कहा कि टीपू सुल्तान ,बहादुर शाह ज़फर यह नाम हिन्दुस्तान की जंगे आज़ादी के इतिहास से हटाये नहीं जा सकते, हमें आने वाली नस्लों तक इस बात को पहुँचाना है.
प्रोफेसर सय्यद अख्तर हुसैन ने उर्दू ज़बान के जंगे आज़ादी में रोल पर रोशनी डालते हुए कहा कि उर्दू शायरी में ही नहीं बल्कि उर्दू पत्रकारिता का भारतीय इतिहास के जंगे आज़ादी में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है और यह सम्मान भी उर्दू पत्रकारिता के पास है कि ब्रिटिश प्रेस एक्ट के अंतर्गत जेल जाने वाला पहला भारतीय पत्रकार भी उर्दू पत्रकारिता करने वाला एक मौलाना था जिसका नाम मौलाना हसरत मोहानी था.

उन्होंने जंगे आज़ादी में मुसलमानों की भागीदारी विषय पर बोलते हुए कहा कि मुल्क के लिए जान देने में मुसलमान कभी पीछे नहीं रहे, चाहे वह जंगे आज़ादी हो या फिर आज का वक़्त, जब भी कुर्बानियों की बारी आई है मुसलमान पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं. यह सिलसिला टीपू सुल्तान से लेकर बिरगेडियर उस्मान वीर अब्दुल हमीद तक और तब से अब तक चला आ रहा है.

सेमिनार में मौलना ज़फरुद्दीन बरकाती संपादक कन्जुल ईमान दिल्ली मासिक, ‘मौलाना अब्दुल मोईद अजहरी संपादक नया सवेरा, गुलाम रसूल देहलवी रिसर्च स्कालर जामिया मिलिया इस्लामिया, मौलाना मकबूल सालिक मिस्बाही, मौलाना मीर सय्यद वसीम अशरफ सदर आल इंडिया सुन्नी मिशन, आदि ने अपने शोध पत्र पढ़े.
कार्यक्रम का संचालन यूनुस मोहानी ने किया, कार्यक्रम की शुरुआत तिलावते क़ुरान ए मजीद से हाफिज़ मोहम्मद निज़ामुद्दीन ने की, हाफिज़ कमरुद्दीन, हाफिज़ मोहम्मद अज़ीम अशरफ, रुखसार फातिमा ने नाते रसूल और गुल्नाज़,मुस्कान,साईमा,रौनक़,कनीज़,मंशा,जन्नतुल फिरदौस,गोसिया,फरहा और ज़िया ने तराना पेश किया.

सेमिनार के संयोजक मोहम्मद हुसैन शेरानी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया, कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान हुआ और मुल्क की तरक्क़ी एवं अमन व शांति की दुआ की गई.

By: Yunus Mohani