मुल्क के लिए जान देने में मुसलमान कभी पीछे नहीं रहे: प्रो. ख्वाजा मोहम्मद इकरामुद्दीन

नई दिल्ली: 25 अगस्त

आल इंडिया उलमा व मशायख बोर्ड के द्वारा एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन दिल्ली के ग़ालिब अकादमी में किया गया जिसका विषय “भारत के निर्माण व विकास में मुसलमानों की भागीदारी “था इस में देश भर से आये शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र पढ़ें.,सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी दिल्ली के प्रोफ़ेसर ख्वाजा मोहम्मद इकरामुद्दीन रहे, कार्यक्रम कि अध्यक्षता सय्यद फरीद अहमद निजामी, वली अहद सज्जादानशीन दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने की, सेमिनार में विशिष्ट अतिथि के रूप में जे एन यू के प्रोफेसर सय्यद अख्तर हुसैन रहे.

सेमिनार में बोलते हुए प्रोफ़ेसर ख्वाजा ख्वाजा मोहम्मद इकरामुद्दीन ने कहा कि जंगे आज़ादी की कामयाबी तभी मुमकिन थी जब पूरा देश एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ता और यही हुआ भी. उन्होंने कहा कि उस दौर में बड़े बड़े मुस्लिम उलमा ने अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद के फतवे दिये जिसके बाद लोग बाहर आये, उलमा ने सिर्फ फतवे नहीं दिए बल्कि खुद भी जंग में सीधे तौर पर कूदे, चाहे वह अल्लामा फजले हक खैराबादी हों या मुफ़्ती इनायतुल्लाह काकोरवी, जौहर बिरादरान हों या फिर मौलाना हसरत मोहानी, हर तरफ आज़ादी के दीवाने अंग्रेजों के खिलाफ सर पर कफन बांधे जंगे आज़ादी में थे, यही वजह थी कि हजारों उलमा को अंग्रेजों ने सड़क के किनारे एक साथ सूली पर चढ़ा दिया और सड़क के दोनों किनारे पर मौजूद पेड़ों पर उलमा की लाशें नज़र आयीं.

उन्होंने कहा कि टीपू सुल्तान ,बहादुर शाह ज़फर यह नाम हिन्दुस्तान की जंगे आज़ादी के इतिहास से हटाये नहीं जा सकते, हमें आने वाली नस्लों तक इस बात को पहुँचाना है.
प्रोफेसर सय्यद अख्तर हुसैन ने उर्दू ज़बान के जंगे आज़ादी में रोल पर रोशनी डालते हुए कहा कि उर्दू शायरी में ही नहीं बल्कि उर्दू पत्रकारिता का भारतीय इतिहास के जंगे आज़ादी में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है और यह सम्मान भी उर्दू पत्रकारिता के पास है कि ब्रिटिश प्रेस एक्ट के अंतर्गत जेल जाने वाला पहला भारतीय पत्रकार भी उर्दू पत्रकारिता करने वाला एक मौलाना था जिसका नाम मौलाना हसरत मोहानी था.

उन्होंने जंगे आज़ादी में मुसलमानों की भागीदारी विषय पर बोलते हुए कहा कि मुल्क के लिए जान देने में मुसलमान कभी पीछे नहीं रहे, चाहे वह जंगे आज़ादी हो या फिर आज का वक़्त, जब भी कुर्बानियों की बारी आई है मुसलमान पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं. यह सिलसिला टीपू सुल्तान से लेकर बिरगेडियर उस्मान वीर अब्दुल हमीद तक और तब से अब तक चला आ रहा है.

सेमिनार में मौलना ज़फरुद्दीन बरकाती संपादक कन्जुल ईमान दिल्ली मासिक, ‘मौलाना अब्दुल मोईद अजहरी संपादक नया सवेरा, गुलाम रसूल देहलवी रिसर्च स्कालर जामिया मिलिया इस्लामिया, मौलाना मकबूल सालिक मिस्बाही, मौलाना मीर सय्यद वसीम अशरफ सदर आल इंडिया सुन्नी मिशन, आदि ने अपने शोध पत्र पढ़े.
कार्यक्रम का संचालन यूनुस मोहानी ने किया, कार्यक्रम की शुरुआत तिलावते क़ुरान ए मजीद से हाफिज़ मोहम्मद निज़ामुद्दीन ने की, हाफिज़ कमरुद्दीन, हाफिज़ मोहम्मद अज़ीम अशरफ, रुखसार फातिमा ने नाते रसूल और गुल्नाज़,मुस्कान,साईमा,रौनक़,कनीज़,मंशा,जन्नतुल फिरदौस,गोसिया,फरहा और ज़िया ने तराना पेश किया.

सेमिनार के संयोजक मोहम्मद हुसैन शेरानी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया, कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान हुआ और मुल्क की तरक्क़ी एवं अमन व शांति की दुआ की गई.

By: Yunus Mohani