मोहब्बत वालों का है हिन्दुस्तान : सय्यद अशरफ

मेरठ : 6 अक्टूबर हिंदुस्तान हर मोहब्बत करने वाले का है यह बात आल इंडिया उलमा मशायख बोर्ड के संस्थापक अध्यक्ष हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने शाहपीर साहब की मस्जिद में आयोजित अजमते हुसैन कांफ्रेंस में बोलते हुए कही ।हज़रत मेरठ में सय्यद अहमद अली सत्तारी की दावत पर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे ,हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की कुर्बानी को याद करते हुए उन्होंने कहा इमाम ने हिन्दुस्तान की तरफ आने की बात कही इसलिए यह हिन्दुस्तान हुसैन का हिन्दुस्तान है यह प्यारी धरती जहां मोहब्बतें बिखरी हुई हैं यह सरजमीं हुसैन के बेटे गरीब नवाज़ की भी है।किसी को कोई हक नहीं है कि वह अपनी विचारधारा किसी पर थोपे जहां लोग इसे राम कृष्ण और नानक की धरती कहते हैं वहीं यह कबीर का हिन्दुस्तान भी है और मोहब्बत वाले इसे ख्वाजा का हिन्दुस्तान कहते हैं इससे जिन्हें परेशानी है वह देश को तोड़ने की साजिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने नफरतें बाटने वाले दुस्साहसी एवम् दुराचारी ज़ालिम शासक यजीद के खिलाफ खड़े होकर बता दिया कि मोहब्बत को मिटाना आसान नहीं है ,ज़ुल्म कुछ देर तो विजय पाता दिखाई देगा लेकिन वास्तविकता यह है कि पराजय उसकी किस्मत है ,हुसैन ने दुनिया को सिखाया कि सर कटा कर अपना पूरा घर लुटा कर किस तरह विजय प्राप्त की जाती है मोहब्बत वालों का यही आचरण है ।
आज हर मोहब्बत वाला हुसैन का है इसमें धर्म की कैद भी नहीं हिन्दुस्तान में ही हुसैनी ब्राह्मण भी हैं सिख भी हैं ईसाई और मुसलमान भी यह है हुसैन की विजय ,विचारधारा की विजय कर्बला में हुसैन की हुईं और कटने के बाद भी उनका सर सबसे बुलंद रहा मजलुमियत में किस तरह जीत हासिल की जाये रहती दुनिया हुसैन से सीखती रहेगी ।
पीर अहमद अली सत्तारि ने कहा कि हुसैन अलैहिस्सलाम से मोहब्बत रखने वाले ज़ुल्म के खिलाफ हर दौर में खड़े होते रहे हैं और मजलूमों की मदद करते रहे हैं देश और समाज में व्याप्त नफरत और भ्रष्टाचार को मिटाना हुसैनियत है और इसे बढ़ावा देना यजीदीयत है।
कार्यक्रम की शुरुआत कुरान की तिलावत के साथ मौलाना मुख्तार अशरफ ने की इसके बाद सय्यद सरमद अली और सय्यद वलीअहमद सत्तारी ने नात और मनकबत पेश की इसके बाद मुफ्ती साजिद हस्नी और नूरमोहम्मद हसनी ने जलसे को खिताब किया जलसे का संचालन मौलाना मोहम्मद सद्दाम ने किया जलसे की सदारत पीर मोहम्मद अली सत्तारी ने की कार्यक्रम का समापन सलातो सलाम के बाद दुनिया में शांति की दुआ के साथ हुआ। बाद में लंगर बांटा गया जलसे में बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की.
By Yunus Mohani

नफरतें कभी जीत नहीं सकती – सय्यद सलमान चिश्ती

अजमेर 27 सितम्बर
दरगाह हज़रत ख़्वाजा गरीब नवाज़ में छटी के मौके पर चिश्ती मंज़िल में मैसेज ऑफ कर्बला नाम से ऑल इण्डिया उलमा मशाइख़ बोर्ड ने कार्यक्रम आयोजित किया जिसकी सरपरस्ती बोर्ड के संरक्षक हज़रत मौलाना सय्यद मोहम्मद मेंहदी मियां चिश्ती ने की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता बोर्ड की अजमेर शाखा के अध्यक्ष हज़रत मौलाना सय्यद शाहिद चिश्ती ने की उन्होंने कहा कि इस वक़्त दुनिया को अगर बचाया जा सकता है तो वह तरीका हज़रत इमाम हुसैन का तरीका है ,ज़ुल्म के खिलाफ खामोश रहना भी ज़ुल्म है । समाज में ज़ुल्म बढ़ रहा है जो तावतवर है वह कमजोर को जीने नहीं देना चाहता नतीजा यह कि हर तरफ लोग परेशान हैं, सब को इन नफरतों के खिलाफ मोहब्बत लेकर खड़ा होना होगा यही पैगाम कर्बला का है जिसे हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ ने आगे बढ़ाया और फरमाया मोहब्बत सबके लिये नफरत किसी से नहीं।
बोर्ड के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव हाजी सय्यद सलमान चिश्ती ने कहा कि नफ़रतें कभी जीत नहीं सकती थोड़ी देर को ऐसा धोका हो सकता है कि नफरत जीत गई लेकिन इस हकीकत को छुपाया नहीं जा सकता कि नफरत हार गई मोहब्बत ही जीती है इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत से यही संदेश मिलता है लोगों ने देखा कि इमाम का पूरा घर कर्बला में है हर वह रिश्ता जिसे हम सबसे ज़्यादा अहमियत देते हैं कर्बला में मौजूद है और सबकी शहादत होती है खेमो को लूटा जाता है लेकिन यह सब होने के बाद मकसदे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जीत जाता है और यजीद की ऐसी हार होती है कि तकयामत तक हर रोज़ वह हारता है जब कहीं सच जीतता दिखता है उसमे यजीद की हार नजर आती है ।उन्होंने कहा कि कर्बला का यही पैगाम है कि नफरत कभी जीत नहीं सकती मोहब्बत को हराया नहीं जा सकता ।लिहाजा करबला के इस मैसेज को हमे आत्मसात करते हुए इस दुनिया में मोहब्बतें बांटनी है तभी हम इमाम हुसैन के सच्चे गुलाम कहलाने के हकदार है ।
कार्यक्रम में बोर्ड के दिल्ली कार्यालय के ज़िम्मेदार मौलाना मुख्तार अशरफ ने बोलते हुए कहा कि सर कटा कर सर कैसे बुलंद किया जाता है यह मिसाल कर्बला के अलावा कहीं और नहीं मिलती हर तरफ ज़ुल्म के मुकाबले में धैर्य जीत गया ऐसी अद्भुत जंग कहीं नहीं मिलती ,उन्होंने कहा सर काटने वाला हार गया और जिसने अपना सर्वसव सत्य के लिए लुटा दिया यहां तक की सर तन से जुदा हो गया लेकिन जीत इमाम की हुईं क्योंकि जिसका मकसद जीत जाता है फतह उसकी होती है ।विचारधारा हुसैन अलैहिस्सलाम की जीती और ज़ालिम यजीद हमेशा के लिये मिट गया यह है हुसैनियत कि मकसद पर कायम रहना ,अपने पथ से न डिगना,सत्य के लिये सबकुछ कुर्बान करने का जज्बा रखना, ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होना ,यह मेरे इमाम का सदका है कि लोग ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होना सीखे और रहती दुनिया तक कोई ऐसा सत्य के लिए अन्न्याय के खिलाफ होने वाला आंदोलन नहीं होगा जिस पर कर्बला का असर न दिखाई दे यह है करबला की जीत और इसका पैगाम यह है कि हर हाल में ज़ुल्म को रोकने के लिये खड़ा होना होगा ।
कार्यक्रम में काफी तादाद में जायरीन शामिल हुए कार्यक्रम के अंत में सलातो सलाम के बाद मुल्क सहित सम्पूर्ण विश्व में शांति की स्थापना की दुआ की गई ।

आल इंडिया उलमा मशाइख़ बोर्ड ने” रैली फॉर रीवर “अभियान का किया समर्थन !!

नई दिल्ली :22 सितम्बर आल इंडिया उलमा मशायख बोर्ड ने ईशा फाउंडेशन द्वारा नदियों को बचाये एवं साफ़ रखने के लिए चलाये जा रहे जागरूकता अभियान “रैली फॉर रीवर “ का समर्थन किया है .

बोर्ड ने अधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि नदियों का संरक्षण मानव जीवन के लिए अतिआवश्यक है यदि जल इसी प्रकार प्रदूषित होता रहा और नदिया सूखती रही तो मानव जीवन दुरूह हो जायेगा .बोर्ड के संयुक्त राष्ट्रिय सचिव हाजी सय्यद सलमान चिश्ती ने कहा कि इस्लाम ने आज से लगभग 1400 साल पहले जल संरक्षण के लिए निर्देश दिए अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहुअलहिवसल्लम ने फरमाया कि नदियों में मल मूत्र का त्याग न किया जाये ,न ही उनमे गन्दगी फैलाई जाये पानी को संरक्षित किया जाये और इसको दूषित होने से बचाया जाये .खुद कुरान में पानी को लेकर कई बाते कही गयी और पानी को इश्वर का तोहफा बताया गया है .

उन्होंने जंगे कर्बला का बयान करते हुए कहा कि हुसैन और उनकी प्यास का ज़िक्र तो सभी कर रहे हैं आइये हम सब इमामे हुसैन रज़िअल्लहुतलान्हु के नाम पर मिलकर नदियों को प्रदूषण से बचाने का काम करें उनको नयी ज़िन्दगी देने के लिए आगे आयें ताकि इमाम ने जिस तरह ज़ुल्म के खिलाफ अपना सब कुछ लुटा कर फतह हासिल की हम भी मानवता के खिलाफ इस ज़ुल्म को रोकने के लिए आगे आयें और नदियों को संरक्षण के इस आन्दोलन का सहयोग करें . यहाँ हमे बस नदियों को प्रदूषण से बचाना है यही हमारा कर्तव्य है और कर्बला कर्त्तव्य से न डिगने का सबक है.
By: Yunus Mohani

देश में अशान्ति फैलाना चाहते हैं पैग़म्बर के दुश्मन : सय्यद मोहम्मद अशरफ

राजस्थान :17 सितम्बर
देश में अशान्ति फैलाना चाहते हैं पैग़म्बर के दुश्मन यह बात आल इंडिया उलमा व मशायख बोर्ड के संस्थापक अध्यक्ष हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने गुजरात कि एक महिला अंजू डांगर द्वारा पैगम्बरे अमन कि शान में गुस्ताखी पर अपना गुस्सा जताते हुए कही ,हज़रत ने साफ़ कहा कि इस्लाम दुश्मन ताक़तें जानती हैं मुसलमान सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अपने रसूल कि शान में गुस्ताखी हरगिज़ बर्दाश्त नहीं कर सकता इसीलिए अब यह आतंकी सोच रखने वाले देशद्रोही अपनी नीचता के चरम पर पहुँच रहे हैं ताकि मुसलमानों को तकलीफ दी जा सके .
हज़रत ने कहा आल इंडिया उलमा मशाइख बोर्ड न सिर्फ इसकी भर्त्सना करता है बल्कि इस औरत को सजा दिलाने के लिए हर मुमकिन कोशिश का एलान भी करता है हम मुल्क के कानून के मुताबिक इसे कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे ,उन्होंने यह भी कहा कि अगर सोशल मीडिया पर इस तरह की घटिया टिप्पड़ी होती रहीं किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के खिलाफ तो भारत में शांति बनी रहना संभव नहीं होगा ,सरकार को इस पर विचार करते हुए इसे रोकना ही होगा ,देश बड़े खतरे के मुहाने पर खड़ा है ऐसे में इस प्रकार की नफरत का प्रचार सिर्फ ज़हर घोलने वाला है .
उन्होंने साफ़ कहा कि हम अपने नबी की शान में किसी भी तरह की गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं करेंगे ,ऐसी नीच सोच रखने वाली महिला को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं है उसे सलाखों के पीछे होना चाहिये.
उन्होंने कहा अगर ऐसा नहीं होता है तो हम देशव्यापी आन्दोलन छेड़ेंगे ताकि आइन्दा किसी भी धर्म या सम्प्रदाए के विरूद्ध ऐसा करने वाला बक्शा न जाये और उसे सख्त से सख्त सजा मिले .यह सिर्फ धार्मिक भावनाए आहत करने भर का मामला नहीं है ,यह मामला देश को सांप्रदायिक आग में झोकने की कोशिश का भी है यानि साफ साफ देशद्रोह का है अतः इस महिला को सख़्त से सख़्त सजा की हम मांग करते हैं.
By: यूनुस मोहानी

میانمار میں انسانی حقوق کی پامالی ، مسلم ممالک اور ہندوستانی مسلمان : ایک محاسبہ

روہنگیا مسلمان آخر مسلم ممالک اور بالخصوص خلیجی ممالک میں کیوں پناہ نہیں حاصل نہیں کرسکے؟
غلام رسول دہلوی
روہنگیا بحران میں انسانی حقوق کی سنگین خلاف ورزی ایک کربناک المیہ ہے ۔ میانمار میں انسانیت ختم ہونے کے دہانے پر ہے۔ خواتین اور بچوں کا قتل عام کیا گیا اور معصوم نوجوان اور بزرگوں کو ایک منظم طریقے سے نشانہ بنایا گیا ۔ اس نازک موڑ پر، روہنگیا مہاجرین کو ملک بدر کرنے کے حکومت ہند کے موقف نے بے شمار مسائل کھڑے کر دئے ہیں اور اسے سپریم کورٹ اور نیشنل ہیومن رائٹس کمیشن کی جانب سے تحقیقاتی سوالات کا سامنا ہے۔ ان کی ملک بدری کے اس منصوبہ نے ہندوستانی مسلم رہنماؤں، دانشوروں اور خاص طور پر ان علماء کے درمیان ایک تناؤ کا ماحول پیدا کر دیا ہے جو روہنگیا مسلمانوں کے لئے ہمدردی کا جذبہ رکھتے ہیں۔ ان کے لئے یہ سمجھنا مشکل ہے کہ جس ملک نے اپنی ابتداء سے ہی مہاجرین کا استقبال کیا ہے وہ وہ ان 40 ہزار روہنگیا مہاجرین کو کس طرح ملک بدر کر سکتا ہے جو اس وقت دنیا کی سب سے زیادہ ستائی ہوئی اقلیت ہیں!
یقیناً 40 ہزار روہنگیا مسلمانوں کو ملک بدر کرنے کا حکومت ہند کا منصوبہ ہمارے وطن عزیز کے تاریخی، تہذیبی ،تکثیریت پسند اقدار کے خلاف ہوگا۔سری لنکا، افغانستان اور تبت سمیت کئی پڑوسی ممالک سے آنے والے مجروح اور کمزور لوگوں کی مدد کرنے کی ہندوستان کی ایک طویل تاریخ رہی ہے۔ اس میں کوئی شک نہیں کہ ہندوستان کے پاس ماضی کے واقعات کے پیش نظر جائز سیکورٹی خدشات ہیں اور وسائل کی کمی کا بھی سامنا ہے ،لیکن ہم یہ بھی نہیں بھول سکتے کہ ہندوستان میں تہذیب و ثقافت اور جمہوریت کی ایک قدیم روایت رہی ہے اور ہم نے دنیا کی تمام خطّوں سے آنے والی مظلوم اقلیتوں کی ہمیشہ مدد کی ہے اور ان کا خیر مقدم کیا۔ اور یہی بات ہمارے ملک کو خوبصورت بناتی ہے۔ ضرورت مند لوگوں کی مدد کرنا ہمارا سنسکار رہا ہے۔
سب سے اہم بات یہ ہے کہ روہنگیا پناہ گزینوں کی مدد مذہب کی بنیاد پر نہیں بلکہ انسانی بنیادوں پر کی جانی چاہئے۔ جو لوگ انسانیت کے بجائے مذہب کی بنیاد پر پناہ گزینوں کی قسمت کا فیصلہ کرنے کی کوشش کر رہے ہیں وہ بھی اپنے اپنے مفادات کو فروغ دینے کی کوشش کر رہے ہیں۔اس لئے ہندوستان کو اپنے پناہ گزین قانون میں مذہبی معیار کو ترک کر دینا چاہئے۔ حکومت ہند نے شہریت کے عمل کو آسان بنانے کے لئے 1955 کی شہریت کے قانون میں ترمیم کی تجویز پیش کی تھی۔ لیکن افسوسناک بات یہ ہے کہ اس نئے بل سے صرف عیسائیت، ہندازم، جین ازم، زرتشت ازم اور سکھ ازم کو ہی فائدہ حاصل ہوگا جنہیں اپنے پیدائشی ملکوں میں اقلیتی مذہب سمجھا جاتا ہے۔ اس بل سے بے گھر مسلم افراد کو خارج کردیا گیا ہے۔ لہذا، بہت سے لوگوں کا ماننا ہے کہ روہنگیا مسلمانوں کو ملک نکالنے کی حکومت کی تازہ ترین تجویز اسی بل کا حصہ ہے۔
اگر چہ ہندوستان نے ایسے کسی بھی معاہدے پر دستخط نہیں کیا ہے جس کی وجہ سے مہاجرین کو پناہ دینا اس کا فر ض ہو ، لیکن اس ملک نے ہمیشہ تنازعات اور آفتوں سے پریشان پناہ گزینوں کو پناہ دیا ہے، خواہ وہ شام کے عیسائی ہوں، مالابار کے یہودی ہوں یا ایران کے پارسی ہوں۔ لہذا، روہنگیا مسلمانوں کو اس ملک سے نکالنا اس کی اس انسانی روایت سے انحراف ہوگا جس پر ہندوستان کئی دہائیوں سے قائم رہا ہے۔
انسانی حقوق ناقابل تقسیم ہیں اسی لئے انسانی حقوق کو کسی ایک یا چند مذاہب و اقوام کے لئے خاص نہیں کیا جا سکتا۔ لہٰذا، اگر ہندوستان روہنگیا مسلمانوں کو میانمار روانہ کر دیتا ہے تو یہ ایک کربناک تاریخی المیہ ہو گا۔ یہ ایسے ہی ہوگا جس طرح کیوبا اور امریکہ نے ہٹلر کے مظالم سے بھاگنے والے 900 سے زائد یہودیوں پر مشتمل سمندری جہاز کو 13 مئی 1939 کو موت کے منھ میں ڈال دیا تھا (جن میں سے کم از کم 250 لوگوں کو نازی جرمنی فوج نےموت کے گھاٹ اتار دیا تھا) ۔
ہمیں یہ بھی سوچنا ہوگا کہ آخر مسلم ممالک روہنگیا مسلمانوں کو پناہ دینے کے لئے کیوں آگے نہیں آ رہے ہیں؟ شام کے پناہ گزینوں کو جرمنی اور دوسرے یوروپین ممالک نے پناہ دی ہے۔ تاہم ، بعض مسلم ممالک انہیں مالی مدد تو پہنچا رہے ہیں لیکن پناہ گزین کی حیثیت نہیں دے رہے ہیں۔ یہ واقعی عالمی مسلم برادری کے لئے ایک’ اجتماعی ذلت’ کی بات ہے کہ اسلامی ممالک روہنگیا پناہ گزینوں سے اپنا منھ موڑ رہے ہیں۔انہوں نے شام، عراق، لیبیا، صومالیا اور دیگر جنگ زدہ مسلم ممالک کے انتہائی مصیبت زدہ مسلم پناہ گزینوں کو بھی پناہ فراہم نہیں کیا ہے۔“Left Out In The Cold” کے عنوان سے انسانی حقوق کی تنظیم ایمنسٹی انٹرنیشنل گلف کوآپریشن کونسل کی 2014 کی ایک رپورٹ کے مطابق ، سعودی عرب، بحرین، کویت، قطر، عمان اور متحدہ عرب امارات جیسے دولت مند ممالک نے بھی سرکاری طور پر ایک بھی شامی پناہ گزین کو نہیں اپنایا ہے۔
وہ مسلم ممالک جن کا شمار امیر ترین اسلامی ملکوں میں ہوتا ہے ، وہ مسلم تارکین وطن اور پناہ گزینوں کو بڑے پیمانے پر مالی امداد اور عطیہ فراہم کرتے ہیں۔ حال ہی میں ترکی نے بھی میانمار میں تشدد سے راہ فرار اختیار کرنے والے روہنگیا مسلمانوں کی امداد کے لئے 10 ہزار ٹن فراہم کرنے کا اعلان کیا ہے۔ لیکن وہ پناہ گزینوں کو اپنے وطن میں پناہ نہیں دیتے ہیں۔ ان میں سے کوئی بھی باضابطہ طور پر مہاجریت کے قانونی تصور کو تسلیم نہیں کرتے ہیں۔
بیشتر ہندوستانی مسلمان یہ محسوس کرتے ہیں کہ تمام روہنگیا مہاجروں کو ملک سے نکالنے کا حکومت کا اقدام “اخلاقی طور پر انتہائی ناپسندیدہ” ہے۔ہندوستان نے ہمیشہ پوری دنیا سے بے گھر مہاجرین کو بچانے کی کوشش کی ہے۔ آل انڈیا علماء و مشائخ بورڈ کے بانی و صدرسید محمد اشرف کچھوچھوی نے کہا کہ حکومت ہند کو ان معصوم مہاجرین کو پناہ فراہم کرنا چاہئے جو اپنی زندگی اور وقار کی حفاظت کے لئے ہندوستان کی طرف امید کی نگاہوں سے دیکھتے ہیں۔ جس طرح ہمارے ہمسایہ ملک بنگلہ دیش نے انسانی بنیادوں پر روہنگیا متاثرین کے لیے نئے دروازے کھولے ہیں اسی طرح ہندوستان کو بھی ان مہاجرین کی مدد کے لیے آگے آنا چاہئے۔
جماعت اسلامی ہند کے صدر مولانا سید جلال الدین عمری نے روہنگیا مسلمانوں کی ہلاکتوں پر گہری تشویش کا اظہار کرتے ہوئے اقوام متحدہ، او آئی سی اور مختلف انسانی حقوق کی تنظیموں سے اس بات کا مطالبہ کیا ہے کہ وہ ان کے اپنے ہم وطنوں کو قتل سے روکنے، ان کی شہریت بحال کرنے، ان پر تمام قسم کی پابندیوں کو ہٹانے اور ان کی سماجی اور اقتصادی ترقی پر توجہ مرکوز کرنے کے لئے برمی حکومت پر دباؤ بنائیں۔
اسی طرح، جمعیت علمائے ہند نے میانمار میں روہنگیا مسلمانوں کے تئیں اپنا رویہ تبدیل کرنے کے لئے ایک آخری معیاد مقرر کرنے کی خاطر سلامتی کونسل کا اجلاس بلانے کے لئے اقوام متحدہ سے اپیل کی ہے۔ جمعیت علمائے ہند نے ہندوستان میں پناہ کی تلاش کرنے والے روہنگیا مسلمانوں کے تئیں حکومت ہند کو روایتی انسانی بنیادوں پر اپنے رویہ سے منحرف نہ ہونے پر بھی زور دیا ہے۔ وسیع پیمانے پر ہندوستانی میڈیا میں شائع ہونے والی خبروں کے مطابق جمعیت علمائے ہند نے حکومت ہند سے کہا ہے کہ “اس سلسلے میں ہندوستان کو یورپی یونین سمیت ترقی یافتہ ممالک کی پیروی کرنی چاہئے”۔
آل انڈیا علماء مشائخ بورڈ ، جمعیت علمائے ہند اور جماعت اسلامی ہند جیسی ہندوستانی مسلم تنظیموں نے حکومت ہند، اقوام متحدہ اور بین الاقوامی انسانی حقوق کمیشن سے بجا طور پر میانمار کے راکھین کے علاقے میں ظلم و ستم کا شکار روہنگیا مسلمانوں کی مدد کرنے کی اپیل کی ہے۔ لیکن کیا انہوں نے اس سلسلے میں عالمی ‘مسلم برادری’ سے بھی موثر اقدامات کرنے کے لئے کوئی اپیل کی ہے؟ کیا انہوں نے یہ سوال اٹھایا کہ روہنگیا پناہ گزین مسلم ممالک اور بالخصوص خلیجی ممالک میں کیوں پناہ نہیں حاصل نہیں کرسکے؟
روہنگیا مہاجرین کا بحران واضح طور پر انسانی حقوق کا ایک مسئلہ ہے۔ لیکن یہ ایک انتہائی افسوس ناک امر ہے کہ جب نام نہاد اسلامی ممالک کے اندر حکومتوں یا دہشت گرد تنظیموں کی ایماء پر اسی طرح کی یا اس سے زیادہ درد ناک انسانی حقوق کی خلاف ورزیوں کا معاملہ سامنے آتا ہے تو ہندوستان میں یہ اسلامی تنظیمیں صدائے احتجاج بلند نہیں کرتی ہیں۔ لہذا، یہ سوال اپنی جگہ بالکل درست ہے کہ کیا انسانی حقوق صرف غیر اسلامی ممالک میں رہنے والی مسلم اقلیتوں کے لئے ہیں؟ کیا علماء اور اسلامی رہنما اس وقت کبھی صدائے احتجاج بلند کرتے ہیں جب مسلم ممالک میں غیر مسلم اقلیات کے حقوق کی پامالی ہوتی ہے، ان کی لڑکیوں کو اغوا کیا جاتا ہے ، “اسلامی ریاست” کے قیام کے نام پر ان کی منفی ذہن سازی کی جاتی ہے اور نکاح الجہاد کے نام پر ان کا استحصال کیا جاتا ہے؟
ہندوستانی مسلمانوں کو یہ محسوس کرنا ہوگا کہ ہماری انسانی اور مذہبی ذمہ داری ہے کہ ہم مسلم ممالک اور خاص طور پر پاکستان اور سعودی عرب جیسے ممالک میں جو کہ اسلامی ہونے کا دعوی کرتے ہیں غیر مسلم اقلیتوں پر ڈھائے جانے والے مظالم کے خلاف بھی صدائے احتجاج بلند کریں ۔ ایک انتہائی اہم اور ضروری سوال یہ ہے کہ جب پاکستان، بنگلہ دیش، انڈونیشیا، ملیشیا، سعودی عرب اور مصر جیسے نام نہاد اسلامی ممالک اور مسلم دنیا کے دیگر حصوں میں مذہبی اقلیتوں کے حقوں کو مکمل طور پر پامال کیا جاتا ہے تو ہندوستان کے مسلم رہنما خاموش تماشائی کیوں بنے رہتے ہیں؟

रोहिंग्या शरणार्थियों पर अनर्गल बयानबाज़ी बंद करें मंत्री- सय्यद अशरफ

चित्तौड़:11 सितम्बर रोहिंग्या शरणार्थियों के मसले पर सरकार के मंत्रियों के बयान से आहत आल इंडिया उलमा मशायख बोर्ड के संस्थापक अध्यक्ष हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने कहा कि अनर्गल बयानबाज़ी बंद करें और मानवता की सेवा के लिये रोहिंग्या शरणार्थियों की मदद का हाथ बढ़ाये सरकार ।
उन्होंने कहा संयुक्त राष्ट्र उच्चायोग ने भी साफ कह दिया है कि शरणार्थियों को खतरे वाली जगह पर वापस नहीं भेजा जा सकता यह नियम सभी राष्ट्रों के लिये बाध्यकारी है ।इस सिद्धांत को अंतरराष्ट्रीय कानून का हिस्सा माना जाता है इसलिए यह सब देशों पर लागू होता है चाहे उन्होंने शरणार्थी समझौते पर हस्ताक्षर किये हों या नहीं ।
हज़रत ने साफ कहा अब सरकार अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट करे कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करेगी या नहीं इसके लिये मंत्रियों को अनर्गल बयानबाज़ी करने की कोई ज़रूरत नही है क्योंकि राजनैतिक लाभ और राष्ट्रहित अलग अलग है ।राष्ट्रहित और मानवता की रक्षा सर्वोपरि है इससे समझौता नहीं किया जा सकता।
हज़रत ने साफ कहा कि अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री को अपने विभाग की योजनाओं पर ध्यान देना चाहिए,वक्फ की लूट पर लगाम लगानी चाहिये न कि अनर्गल बयानबाज़ी करनी चाहिए।
उन्होंने एक बार फिर भारत सरकार से मांग की रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में रहने दिया जाय जबतक बर्मा में हालात सामान्य नहीं हो जाते और बर्मा सरकार से नरसंहार को रोकने के लिये कहे।हज़रत ने लोगों से इन शरणार्थियों की भरसक मदद करने की अपील भी की।

सरकार बर्मा के बेगुनाहों को पनाह दे, मानवता को शर्मसार होने से बचाये : सय्यद मोहम्मद अशरफ

अजमेर:7 सितम्बर
भारत सरकार बर्मा से जान बचा कर आये बेगुनाह शरणार्थियों को शरण दे और मानवता को शर्मसार होने से बचाये,यह बात आल इंडिया उलमा मशाइख बोर्ड के संस्थापक अध्यक्ष हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने अजमेर शरीफ में कही। उन्होंने कहा भारत एक शांतिप्रिय देश है और सम्पूर्ण विश्व में शांति स्थापना के लिए सदैव प्रयत्नरत रहा है, इस समय जब बर्मा जो कि आदि भारत का ही अंग था वहां हिंसा चरम पर है, मानवता शर्मसार हो रही है, महिलाएं बच्चे बुज़ुर्ग, जवान कोई महफूज़ नहीं है और बर्मा में बरबरियत के साथ मानवता की हत्या की जा रही है। ऐसे में सरकार का रोहिंग्या शरणार्थियों से देश छोड़ने का आदेश निंदनीय है, हम सरकार से मांग करते हैं कि मानव जीवन बहुमूल्य है इसे बचाने के लिये हर संभव प्रयास किया जाना चाहिये। जिस प्रकार पड़ोसी देश बांग्लादेश ने मानवता के आधार पर दुखी लोगों के लिए दरवाज़े खोल दिये है भारत को भी आगे आकर रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए मदद हाथ बढ़ाना चाहिए।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ से भी इस संबंध में तुरंत कारगर क़दम उठाने की मांग की। हज़रत ने कहा कि सबको जहां बर्मा के लोगों के लिये दुआ करनी चाहिए वहीं रोहिंग्या शरणार्थियों तक मदद भी पहुंचानी चाहिए।
आल इंडिया उलमा मशाइख़ बोर्ड के संरक्षक व दरगाह अजमेर शरीफ के गद्दीनशीन हज़रत सय्यद मेहदी मिंया चिश्ती ने कहा कि दुनिया को मोहब्बत की ज़रूरत है और हम नफरत की फैक्ट्रीय लगा रहे हैं, धर्म के आधार पर शरणारथियों की स्थिति तय की जाएगी तो हम क्या संदेश देना चाहते हैं। निहत्थे जान बचाकर भागे लोगों से देश को खतरा कैसे हो सकता है। मानवता हमारी ज़रूरत है, सरकार को आगे बढ़ कर मदद करनी चाहिए।
आल इंडिया उलमा मशाइख बोर्ड के संयुक्त राष्ट्रीय सचिव सय्यद सलमान चिश्ती ने कहा कि” अतिथि देवो भव:” सिर्फ पर्यटन विभाग के प्रचार की सामग्री नहीं है यह भारत की संस्कृति है, उन्होंने बताया भारत के संसद भवन पर अंकित वसुधैव कुटुंबकम् का वाक्य हमारी धारणा का प्रतीक है कि हम सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानते हैं और प्रधानमंत्री जी इसका उपयोग हर जगह करते हैं ऐसे में रोहिंग्या शरणार्थियों के संबंध में किरण रिज्जु का बयान प्रधानमंत्री के शब्दों के विपरीत है। कोई भी धर्म कभी खून बहाना नहीं सिखाता. मैं जितना जानता हूं उसके आधार पर शरणार्थियों की सेवा एंवम् सहायता के लिए हर धर्म ने सीख दी है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हर हाल में हमे बर्मा के शरणार्थियों को भारत में शरण देनी चाहिए,सरकार का यह फैसला की वह देश छोड़ कर चले जाएँ उचित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा का भी यह उल्लघन प्रतीत होता है. हम भारत सरकार से मांग करते हैं कि अपना फैसला वापस ले।

Follow the country’s law along with the religion on the occasion of Eid-ul-Azha : Syed Mohammad Ashraf

Ajmer: August 29
On the occasion of the upcoming festival, Eid-ul-Azha, Muslims will be sacrificing the animals while exercising the right to freedom of religion. But at the same time, they should also take care of the laws of the country. This point was particularly highlighted by the Founder and President of All India Ulama & Mashaikh Board, Hazrat ​​Sayed Mohammad Ashraf in Ajmer Sharif Dargah Khwaja Gharib Nawaz (Rahmatullah alaih) in the gathering of Chhati Sharif in Baitun Noor.
He appealed to the people and said that in many places now, some enemies of peace and the people might try to spoil the atmosphere of peace during the sacrifice. “Therefore, we need to work with patience and respect the law of the country and follow it completely”, he said.
He also said that people should not sacrifice in open places. Our Deen (religion) also says this. We should not shed the blood of the Qurbani in the drains, rather bury it, as well as those parts of the animal which are not eaten and the food which is forbidden in Islam should also be buried. We do not have permission to give any of them to anyone else because we cannot give any such food to anyone. At the same time, we must take care of cleanliness so that nobody could have trouble with our sacrifice.
Hazrat further said: we have to make special arrangements to bring the meat of the Qurbani to the disadvantaged, less-fortunate and the poorest of the poor. He said that there is no restriction on sacrifice in our country, but we must take care of the feelings of those practicing other religions and faiths. We have to fulfill the rights of our neighbors and non-Muslims, while we take care of our co-religionists, because we are Muslims, so we must maintain peace and tranquility. This responsibility is ours. He also congratulated the people on Hajj.
Hazrat Maulana Syed Mehdi Mian Chishti congratulated the people on Khwaja Gharib Nawaz’s Chatti Sharif saying that the occasion of Eid-ul-Adha is the best way to get closer to our lord.
Syed Mehdi Mian continued: Every capable Muslim should sacrifice, but we must take care that no one’s heart is hurt, no one is troubled, and it does not spread any kind of dirt. This is the only way we can emulate the example of Hazrat Gharib Nawaz Moinuddin Chishti (r.a).
If someone’s heart is broken, it is a big sin like breaking God’s house. “Hearts are to be connected, not to be broken”….. “You cannot achieve the pleasure of your Lord (Rabb) until you help the disturbed people”, he said.
Joint National Secretary of the AIUMB, Haji Syed Salman Chishti, with the grace of Huzur Gharib Nawaz, greeted on Eid-e-Ibrahimi and the Haj pilgrimage, saying that one should remember that in many parts of the country, people are upset with the flood. We have to help them on this occasion of Eid. Qurbani also teaches us that we are sacrificing our pleasure and welfare for the sake of our Lord. This feeling has to be awakened and spread widely, because human life is in danger and doing something about it is the means to achieve the pleasure of our Lord (Rabb-ul-Alameen). We have to tread the path of Sufia to benefit larger section of the people. “Love for everyone, hatred for none” is the only way to save the world from chaos and strife”, he said.
By: Ghulam Rasool Dehalvi

18th Century Ulema: The Unsung Heroes of the First Indian Independence War In 1857: By Ghulam Rasool Dehlvi

By Ghulam Rasool Dehlvi
29 August 2017
On this Independence Day, we need to also remember the freedom strugglers who have been forgotten almost completely. The first Indian freedom movement of 1857 should particularly be recalled in this context. While 70 percent of the soldiers came from the Hindu or Sikh community, the Ulema and Muslim leaders like Maulana Fazle Haq Khairabadi, Maulana Ahmed Shah, Bahadur Shah Zafar, Khan Bahadur Khan, Begum Hazrat Mahal, Firoz Shah and Azimullah Khan were the most prominent characters in the annals of the revolt. Remarkably, Nana Sahib, Rani Laxmi Bai and Tantya Tope declared Bahadur Shah Zafar, a Muslim King, India’s first independent ruler on May 11, 1857. Similarly, Ram Kunwar Singh, Raja Nahir Singh, Rao Tula Ram exerted herculean efforts and sacrifices to uphold the 1857 revolt.

During the 1857 revolt, India’s top Ulema declared the rebellion for freedom as “Wajib-e-Deeni” (religious obligation). They issued an anti-British fatwa while actively participating in the blood-spattered insurgents. Among the most forgotten Ulema and Maulvis who valiantly campaigned for an independent India were: Maulana Sadruddin Azurda Dehlvi, Maulana Ahmadullah Shah Madrasi, Maulana Fazle Haq Khairabadi, Maulana Kifayat Ali Moradabadi, Maulana Rahmatullah Kairanvi, Imam Bakhsh Sahbai Dehlvi and Maulana Wazir Khan Akbarabadi. These Ulema were imbued in an Indian strain of Islam with a pluralistic and nationalistic ideology originally underpinned by the Sufi mentors such as Mirza Mazhar Jaan-e-Jaanan (1195-1781), Shah Abdul Aziz Dehlvi (1239-1824), Qazi Sana’ullah of Panipat (1225-1810), Shah Rafiuddin Dehlvi (1233-1818) and Mufti Sharfuddin Rampuri (1268-1852). Their exhortation of nationalism called Hubb-ul-Watani (love for the country) was the driving force behind the Ulema’s fierce struggles and sacrifices in the Independence movements from 1857 to 1947. I suffice to reproduce three prominent examples from the Indian Ulema’s traditions and accounts.

Maulana Fazle Haq Khairadabadi (1797–20 August 1861)

A leading revolutionary in the 1857 revolt was Maulana Fazle Haq Khairadabadi, son of Allama Fazle Imam Farooqi, the Grand Mufti of Delhi in the 18th century and a disciple of the noted Sufi master, Shah Abdul Qadir (1230/1815). He rendered various services to the country but the anti-British fatwa known as “Tahqeeq al-Fatwa fi Ibtal al-Taghwa” (fatwa in refutation of the devil) was his most remarkable contribution to India’s first freedom struggle.

Vivek Iyer noted in his book “Ghalib, Gandhi and the Gita” that Khairabadi was a celebrated poet, philosopher and social scientist, but was most remembered as a freedom struggler of the 1857 Indian rebellion. He took up service with the government in 1815 but resigned from the job in 1831 and spent most of his time in an intellectual activism for the country’s freedom. He penned down a comprehensive historical account of the 1857 revolt in Arabic titled “al-Thaura al-Hindiya” (Indian rebellion). After his resignation from the services of the British government, Khairabadi got an opportunity to serve the Nawab of Jhajjar. He was also close to Bahadur Shah Zafar. When the 1857 revolt broke out, he travelled from Alwar to Delhi several times to hold meetings with Bahadur Shah Zafar. Munshi Zakaullah notes in his famous research work in Urdu “Taarikh-e-‘Urooj-e-Saltanat-e-Englishiah (History of the British government’s rise in India):

“When General Bakht Khan, along with his fourteen thousand soldiers, came for Bareilly to Delhi, Maulana Khairabadi delivered a Friday sermon before hundreds of Ulema in Delhi’s Jama Masjid. He put fourth an Islamic decree (Istifta) on the freedom fight for the country with the signatures of Mufti Sadruddin Azurda, Maulvi Abdul Qadir, Qazi Faizullah Dehlvi, Maulana Faiz Ahmed Badayuni, Dr. Wazir Khan Akbarabadi, Syed Mubaraksha Rampuri”.

No sooner did this fatwa against the British was declared and widely disseminated, the revolt intensified throughout the country. Some ninety thousand soldiers gathered in Delhi. Quoting from the “Akhbar-e-Dehli” of Chunni Lal, a contemporary Urdu researcher Khushtar Noorani writes: Maulana Khairabadi continued to hold gatherings delivering sermons on the significance of the jihad against the British to rescue the country which was Darul Islam (abode of Islam) in his view”.

In January 30, 1859, Khairabadi was arrested by the British authorities and a case was filed against him for ‘taking a leadership role in the rebellion’, as C. Anderson records in “The Indian Uprising of 1857-8: prisons, prisoners, and rebellion”. He was tried in the court and was sentenced to imprisonment at Kalapani (Cellular Jail) on Andaman Island with confiscation of his property by the Judicial Commissioner, Awadh Court. During the court proceedings, Maulana himself defended his case and categorically stated in the court that he had issued the anti-British fatwa with his free will, not by compulsion. He reached Andaman on 8 October 1859. Sir William Wilson Hunter, a Scottish historian and a compiler and a member of the Indian Civil Service, writes: “Fazl-e-Haq was an alim (Islamic scholar) who was sentenced to imprisonment in the Kaala Paani and whose library was confiscated and brought to Calcutta by the English government”. (Hamare Hindustani Musalamaan, [Urdu] Page: 203, Delhi).

Mufti Sadruddin Azurda Dehlvi (1804 -1868)

One of the most notable revolutionaries of the 1857 revolt in Delhi was Mufti Sadruddin ‘Azurdah’. An intellectual, spiritually inclined literary figure from the Kashmiri origin, Azurdah was a disciple of the renowned and authoritative classical scholar of Islam Maulana Fazl-e-Imam Faruqi (1244/1829) of Khairabad located in Sitapur (Uttar Pradesh).

Notably, Azurdah was Delhi’s Grand Mufti, an excellent Urdu poet and a bosom friend of Mirza Ghalib. His proactive engagement with the revolt of freedom in 1857 resulted in the loss and devastation of all his poetry during the riots. The only known collection of his poetry is the “Surviving Poetic work of Azurdah” compiled by A’bdur Rahman Parwaz from various Tazkiras (memoirs). One of the architects of modern Muslim mindset in India, Sir Syed Ahmed Khan mentioned Azurda in his book “Asaar-us-Sanadid” (the remnants of ancient heroes) as a “well-versed Muslim scholar of his age”.

When the Ulema of Delhi declared Jihad against the British, the fatwa was signed by Azurdah as published in the famous Urdu daily Akhbaar-uz-Zafar dated July 26, 1857. The newspaper is preserved in Delhi’s National Archives. Azurdah is also reported to have been the mediator between the English and Mughal elites in the early days of the British ascendancy in Delhi. He held meetings and consultations with Bahadur Shah Zafar in the Red Fort during the Mutiny to help the Indian revolutionaries further their cause. When the British curbed the 1857 revolt, a case for rebellion was filed against Azurdah. He was tried in the court and suffered a painful imprisonment. Consequently, a large part of his property was confiscated. The British authorities destroyed almost 3 Lakh books collected in Azurdah’s personnel library.

Remarkably, Azurda trained many Ulema and scholars like Maulana Ahmadullah Shah Madrasi and sent them to Agra in 1846 where they established a council of Ulema (Majlis-e-Ulema) to systematically campaign for the rebellion against the British colonialism.

Maulana Ahmaddullah Shah Madrasi (1787-1858)

In his well-researched work in Urdu, Taarikh-e-Jang-e-Azadi-e-Hind 1857 (page: 205), Syed Khurshid Mustafa Rizvi writes: “Ahmaddullah Shah prominently figures the list of ulema who prepared the whole country for the 1857 Revolt….He visited different parts of the country and instigated the people for the Revolt.”

Ahmaddullah Shah was a spiritually inclined Alim or Islamic scholar. He got fascinated towards a mystical lifestyle from his youth. Therefore, he left his home and travelled far and wide, from Hyderabad and Madras to England, Egypt, Hijaz, Turkey, Iran and Afghanistan. Back in India, he spent most of his life in mysticism and even in Chillahkashi (Sufi practice of mystical seclusion for 40 continuous days) at Bikaner and Sambher.

He attained the spiritual disciplehood of his Pir-o-Murshid (Sufi master) Mir Qurban Ali Shah in Jaipur where he was granted the Ijazat-O-Khilafat (spiritual succession and authorization). From Jaipur, he travelled to Tonk where he held the Mahfil-e-Sima (gathering for mystical music) which was criticized by the conformist Ulema. Dismayed by their objection, he left for Gwalior where he met another Sufi mystic Mehrab Shah Qalandar. Having granted him the Ijazat-o-Khilafat, Shah Qalandar exhorted him to work for India’s freedom movement. Therefore, he left Gwalior for Delhi in 1846.

In Delhi, he met Mufti Sadruddin Azurda who directed him to go to Agra which he thought was the best place for a better and successful preparation for the campaign against the British oppression. In Agra, he consolidated ties with the leading Ulema who cooperated him in the formation of Majlis-e-Ulema (Council of Ulema) to campaign against the British regime.

In the famous book, “The Indian mutiny of 1857” edited by Colonel Malleson, Maulana is mentioned as follows: “If a patriot is a man who plots and fights for the independence, wrongfully destroyed, for his native country, then most certainly, the Maulvi (Ahmadullah) was a true patriot”.

The British historian Malleson has described Maulana in these words: “The Maulvi was a very remarkable man…. In person, he was tall, lean and muscular with large deep set eyes, beetle brows, a high aquiline nose, and lantern jaws….. The British considered him a worthy enemy and a great warrior”.

Malleson further writes that “no doubt, the leader behind this conspiracy (1857) which had spread all over India was the Maulvi (Ahmadullah)…….. I think that he the brain behind the revolt”. During his journeys, Maulana introduced a novel scheme which is known as the ‘Chapati scheme’. He devised the circulation of Chapatis from hand to hand to disseminate the message amongst the rural population of the North India that a great uprising would take place. The English historian G.W. Forest heaps high praises on the Maulana for being a ‘practicing alim’, a ‘Sufi soldier’ and commander with great military skills (Kaye’s and Malleson’s History of the Indian mutiny of 1857-8).

In his article, “Maulvi Ahmedullah: The Unsung Hero of the Revolt” published in Radiance Viewsweekly, Mohd. Asim Khan depicts a portrait of how valiantly Maulana fought against the British: “Maulvi Ahmedullah Shah was a rare combination of both a writer and a warrior. He used his sword valiantly, and his pen effortlessly for awakening and mobilising the people against the foreign subjugation…..He wrote revolutionary pamphlets and started distributing them. It was too much for the imperialists and they ordered his arrest. He was tried for sedition and sentenced to be hanged”.

The British officers declared a reward of Rs. 50,000 for capturing Maulana alive. The proclamation reads: “It is hereby notified that a reward of Rs.50, 000 will be paid to any person who shall deliver alive, at any British Military post or camp, the rebel Moulvee Ahmed Molah Shah, commonly called “the Moulvee”. It is further notified that, in addition to this reward, a free pardon will be given to any mutineer or deserter, or to any rebel, other than those named in the Government Proclamation No. 476 of the lst instant, who may so deliver up the said Moulvee”.

Noted Urdu historian of Karachi, Prof. Mohammad Ayyub Qadri writes: “The martyrdom of Maulana Ahmadullah put an end to the [first] war of independence, not only in Ruhelkhand But in the entire country” (Jang-e-Azadi-e-Hind 1857, P. 303).

The author is a scholar of classical Islamic studies, cultural analyst and researcher in media and communication studies and regular columnist with New Age Islam.

ईद उल अज़हा के मौक़े पर मज़हब के साथ मुल्क के क़ानून का भी पूरा पालन करें मुसलमान : सय्यद मोहम्मद अशरफ

अजमेर: 29 अगस्त
आने वाले त्योहार ईदुल अज़हा के मौक़े पर मुसलमान जहां मज़हबी आज़ादी के अधिकार पर अमल करते हुए क़ुर्बानी करें वहीं मुल्क के क़ानून का भी पूरा ख्याल रखें. यह बात आल इंडिया उलमा मशाइख़ बोर्ड के संस्थापक व अध्यक्ष हज़रत सय्यद मोहम्मद अशरफ किछौछवी ने अजमेर शरीफ में दरगाह ख्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैहि में छटी शरीफ की नजर के बाद बैतुन नूर में कही।
हज़रत ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि कई जगह इस बार कुछ इंसानियत और अमन के दुश्मन लोग और संगठन क़ुर्बानी के दौरान अमन खराब करने की कोशिश कर सकते हैं लिहाजा सब्र से काम लें और मुल्क के क़ानून का सम्मान करते हुए उसका पूरा पालन करें ,उन्होंने कहा कि लोग हरगिज़ खुली जगह क़ुर्बानी न करें, दीन भी यही कहता है, क़ुर्बानी के खून को नालियों में न बहाएँ बल्कि उसे दफन करें, साथ ही जानवर के वह अंग जो खाऐ नहीं जाते और इस्लाम में जिनका खाना मना है उसे भी दफन करें, इन्हे किसी को देने की इजाजत नहीं है क्योंकि आपके लिए जो खाना ठीक नहीं वह आप किसी को नहीं दे सकते, साफ सफाई का पूरा ख्याल रखें, किसी को आपकी वजह से परेशानी नहीं होनी चाहिए।
हज़रत ने कहा कि आप क़ुर्बानी का गोश्त ग़रीबों और परेशान हालों तक पहुंचाने का खास इंतज़ाम करें। हज़रत ने बताया कि हमारे मुल्क में क़ुर्बानी पर कोई पाबंदी नहीं है लेकिन किसी गैरमज़हब के मानने वाले की भावनाओं का हमें ख्याल रखना चाहिए, हमें अपने पड़ोसी का हक़ अदा करना है, अपने हमवतन का ख्याल रखना है क्योंकि हम मुसलमान हैं तो अमन क़ायम रखने की ज़िम्मेदारी हमारी है।उन्होंने लोगों को हज की मुबारकबाद दी।
बोर्ड के संरक्षक हज़रत मौलाना सय्यद मेहदी मियां चिश्ती ने लोगों को ख्वाजा गरीब नवाज़ की छटी शरीफ की मुबारकबाद देते हुए कहा कि क़ुर्बानी अपने रब से क़रीब होने का बेहतरीन ज़रिया है और हर साहिबे हैसियत पर क़ुर्बानी वाजिब है लेकिन ख्याल रहे कि हरगिज़ किसी का दिल न दुखे, किसी को परेशानी न हो,गंदगी बिल्कुल न फैले, इसका खास ख्याल रखे, ग़रीब नवाज़ का यही पैग़ाम तो है कि किसी का दिल तोड़ना अल्लाह का घर तोड़ने से बड़ा गुनाह है, लिहाजा दिलों को जोड़िए और ख्याल रहे कि इंसान तब तक अपने रब की खुशी हासिल नहीं कर सकता जब तक वह परेशान हाल लोगों की हैसियत रखते हुए मदद नहीं करता।
बोर्ड के संयुक्त राष्ट्रीय सचिव सय्यद सलमान चिश्ती ने सभी को गरीब नवाज़ की छटी के साथ ही ईद ए इब्राहीमी और हज की मुबारकबाद देते हुए कहा कि हमें याद रहना चाहिए कि मुल्क के कई हिस्सों में बाढ़ से लोग परेशान हैं, हमें उनकी मदद करनी है और यह ईद हमें यही सिखाती भी है कि अपने रब की खुशी के लिए हम अपना माल क़ुर्बान करते हैं. इसी एहसास को और जगाना है, क्योंकि इंसानी ज़िंदगियां खतरे में है और रब की खुशी हासिल करने का हमारे पास ये ज़रिया है। ज़रूरतमंद की मदद करना ही सुफिया का तरीका रहा है. यही नबी का दीन है। मोहब्बत सबके लिए नफरत किसी से नहीं. यही पैग़ाम है दुनिया को नफरतों से बचाने का।
By: यूनुस मोहानी